चूहों को खेतों से दुर भगाने के उपाय

मई-जून के महीने में फसल कटाई के बाद खेतों में चूहों का प्रबंधन करना चाहिए, कृषि विज्ञान केन्द्र, अंबेडकर नगर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. रवि प्रकाश मौर्या बता रहे हैं कैसे चूहों का प्रबंधन कर सकते हैं। ये कुछ उपाय अपना कर किसान अपनी उपज को सुरक्षित रख सकते हैं।

गेहूं की फसल को चूहों से सुरक्षित रखने के लिए करें ये उपाय

चूहों की संख्या मई-जून माह में कम होती है, यही समय चूहा नियंत्रण अभियान के लिए सही समय होता है, यह अभियान सामूहिक रूप में चलाना चाहिए। चूहे खेत खलिहानो, घरों और गोदामों में अनाज खाने के साथ-साथ ही अपने मलमूत्र से अनाज बर्बाद कर देते हैं।

संसारों में चूहे की पांच सौ से भी अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं, एक जोड़ी चूहा एक वर्ष में 800-1000 की संख्या में बढ़ जाते हैं, इसके प्रबंधन के लिए कम से कम तीस-चालीस लोगों की जरूरत होती है। पहले दिन खेत का सर्वेक्षण किया जाता है, जहां बिल मिले उसे मिट्टी से बंद कर देना चाहिए।

दूसरे दिन जो भी बिल खुले हों, वहां पर चावल या फिर चना के दाना रख देना चाहिए, ऐसे दो-तीन दिनों तक दाना रखें और चौथे दिन जहर मिलाकर दाना रखें। दाने का विषाक्त बनाने के लिए सरसो के तेल, एक ग्राम जिंक फास्फाइड दानों में मिलाकर रख दें। पांचवे दिन सुबह मरे हुए चूहों को और बचे हुए दानों को इकट्ठा कर जमीन में गड्ढ़ा खोदकर दबा दें।

ये भी उपाय अपना सकते हैं

चूहे को मीठा पसंद होता है। किसान खेतों में हो या घर पर, अनाज भण्डारण गृह में जलेबी का पाक जो आसानी से मिल जाता है, जलेबी के पाक में रूई की छोटी-छोटी गोली बना कर डूबा दें। जब वो गोलियां पूरी तरह से भीग जाएं तो चूहों के बिल के पास रख दें।

चूहा उसे आसानी से खा लेता हैं। वह रूई की गोली चूहे की आँतों में फंस जाती है। कुछ समय के बाद चूहे की मौत हो जाती है। प्याज की खुशबू चूहों से बर्दाश्त नही होतीं। इसलिए उन जगहों पर प्याज के टुकड़े डाल दें, जहां से चूहे आते हैं।

लाल मिर्च खाने में प्रयोग होने वाली लाल मिर्च चूहों को भगाने के लिए काफी कारगर है। जहां से चूहें ज्यादा आते हैं, वहां पर लालमिर्च का पाउडर डाल दें। इंसानों के बाल से भी चूहे भागते हैं। क्योंकि इसको निगलने से इनकी मौत हो जाती है इसलिए इसके नजदीक आने से ये काफी डरते हैं।

ऐसे करें चीनी से 250 गुना ज्यादा मीठे स्टीविया की खेती

भारत में औषधीय पौधों की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जा रहा है। मधुमेह और मोटापा आदि के उपचार में इस्तेमाल किए जाने वाले स्टीविया की खेती के लिए फरवरी-मार्च का समय सबसे उपयुक्त होता है।

स्टीविया चीनी से 250 गुना ज्यादा मीठा होता है, लेकिन इसमें कैलोरी शून्य होती है। बाज़ार में मिलने वाले रासायनिक मिठास वाले पदार्थों के ज्यादा इस्तेमाल से किडनी खराब होने को खतरा रहता है, जबकि स्टीविया के इस्तेमाल में ऐसा कोई डर नहीं है। आजकल स्टीविया की खेती का चलन तेजी से बढ़ा है। किसान इसकी खेती बड़ी मात्रा में कर रहे हैं।

स्टीविया का उपयोग आजकल चीनी की जगह खूब हो रहा है क्योंकि इसकी पत्तियां मीठी तो होती हैं, लेकिन इसमें कैलोरी की मात्रा न के बराबर होती है इसलिए इसे पारंपरिक चीनी से अच्छा माना जाता है। इन्हीं गुणों के कारण स्टीविया की खेती करने में किसान का काफी फायदा होता है।

जलवायु

स्टीविया की खेती सालभर की जा सकती है, बस इसे बरसात के मौसम में उगाने से बचना चाहिए। इसकी खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली जमीन होना आवश्यक है।

स्टीविया की किस्में

ऐसे तो स्टीविया की कई किस्में बाजार में मिल जाएंगी पर सीमैप ने स्टीविया की दो नई किस्में विकसित की हैं। इनके नाम हैं स्टीविया मीठी और स्टीविया मधु। ’ इसके अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने भी स्टीविया की दो किस्में निकाली हैं जो बाजार में एमडीएस-13 और एमडीएस-14 के नाम से मिल जाती हैं।

रोपाई

स्टीविया वर्ष भर में कभी भी लगाई जा सकती है लेकिन उचित समय फरवरी-मार्च का महीना है। स्टीविया के पौधों की रोपाई मेड़ों पर की जाती है। इसके लिए 15 सेमी ऊंचाई के दो फीट चौड़े मेड़ बना लिए जाते है। उन पर कतार से कतार की दूरी 40 सेमी और पौधों में पौधे की दूरी 20-25 सेमी रखते हैं, दो मेड़ों के बीच 1.5 फीट की जगह नाली या रास्ते के रूप में छोड़ देते हैं।

खाद एवं उर्वरक

क्योंकि स्टीविया की पत्तियों का मनुष्य द्वारा सीधे उपभोग किया जाता है। इस कारण इसकी खेती में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशी का प्रयोग नहीं करते हैं। एक एकड़ में इसकी फसल को तत्व के रूप में नाइट्रोजन ,फास्फोरस व पोटाश की मात्रा क्रमश: 110:45:45 किग्रा के अनुपात की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति के लिए 70-80 कुंतल वर्मी कम्पोस्ट या 200 कुंतल सड़ी गोबर की खाद पर्याप्त रहती है।

सिंचाई

स्टीविया की फसल सूखा सहन नहीं कर पाती है। इसको लगातार पानी की आवश्यकता होती है, सर्दी के मौसम में 10 दिन के अन्तराल पर व गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए वैसे स्टीविया भी फसल में सिंचाई करने का सबसे उपयुक्त साधन िस्प्रंकुलरर्स या ड्रिप है।

खरपतवार नियंत्रण

सिंचाई के पश्चात खेत की निराई खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए जिससे भूमि भुरभुरी व खरपतवार रहित हो जाती है जो कि पौधों में वृद्धि के लिए लाभदायक होता है।

रोग एवं कीट नियंत्रण

स्टीविया की फसल में किसी भी प्रकार का रोग या कीड़ा नहीं लगता है। कभी-कभी पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते है जो कि बोरान तत्व की कमी के लक्षण है। इसके नियंत्रण के लिए छह प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव किया जा सकता है। कीड़ों की रोकथाम के लिए नीम के तेल को पानी में घोलकर स्प्रे किया जा सकता है।

फूलों को तोड़ना

स्टीविया की पत्तियों में ही स्टीवियोसाइड पाये जाते हैं इसलिए पत्तों की मात्रा बढ़ायी जानी चाहिए और समय-समय पर फूलों को तोड़ देना चाहिए। अगर पौधे पर दो दिन फूल लगे रहें व उनको न तोड़ा जाए तो पत्तियों में स्टीवियोसाइड की मात्रा में 50 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।

फूलों की तुड़ाई, पौधों को खेत के रोपाई के 30, 45, 60, 75 और 90 दिन के पश्चात व प्रथम कटाई के समय की जानी चाहिए। फसल की पहली कटाई के पश्चात 40, 60 व 80 दिनों पर फूलों को तोड़ने की आवश्यकता होती है।

लाभ

वर्षभर में स्टीविया की तीन- चार कटाइयों में लगभग 70 कुंतल से 100 कुंतल सूखे पत्ते प्राप्त होते हैं। वैसे तो स्टीविया की पत्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव लगभग 300-400 रुपए प्रति किग्रा है लेकिन अगर स्टीविया की बिक्री दर रुपए 100 प्रति किग्रा मानी जाए तो कुल तीन वर्षों में लगभग एक एकड़ से पांच से छह लाख का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

 

किसानो की देसी जुगाड़ : देसी शराब के छिड़काव से पैदा की जा रही ज्यादा सब्जी

फसलोंकी ग्रोथ और पैदावार बढ़ाने के लिए अब किसानों ने नया तरीका ईजाद किया है। शेखावटी के किसान खेतों में कीटनाशक की बजाय देसी और अंग्रेजी शराब का छिड़काव कर रहे हैं। किसानों के अनुसार कीटनाशकों के दाम बहुत ज्यादा होने से फसलों को बचाने के लिए शराब का इस्तेमाल शुरू किया गया है।

इससे फसलों में ग्रोथ भी हो रही है और पैदावार भी बढ़ रही हैं। भास्कर ने झुंझुनूं, सीकर, चूरू जिलों के कई खेतों में पहुंचकर पांच दिन तक पड़ताल की। खेतों में किसान देसी अंग्रेजी शराब का छिड़काव करते हुए देखे गए।

इन क्षेत्रों में लहलहाती फसलों से उठती शराब की दुर्गंध से महसूस होता है कि फसलें शराब के नशे में झूम रही हैं। फल और सब्जियों पर तो आमतौर पर देशी शराब का छिड़काव किया जाता रहा है लेकिन अब फसलों पर देशी और अंग्रेजी शराब बहाई जा रही है।

कृषि विशेषज्ञ इस तरह के किसी भी साइंटिफिक रिसर्च से इनकार करते हैं लेकिन किसानों का तर्क है कि शराब फसल और सब्जियों के लिए महंगे कीटनाशकों से ज्यादा उपयोगी है।

पैदावार ज्यादा, कीट का डर नहीं

किसानोंका मानना है कि देशी और अंग्रेजी शराब के इस्तेमाल के बाद उनकी पैदावार में इजाफा हुआ है। झुंझुनूं जिले के भड़ौन्दा खुद गांव के किसान प्रदीप झाझड़िया का कहना है कि हम पिछले तीन साल से चने की खेती में कीटनाशक की जगह शराब का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसके कारण पैदावार में इजाफा हुआ है।

सीकर जिले के धर्मशाला गांव के किसान श्रवण कुमार के मुताबिक शराब के छिड़काव से तीसरे ही दिन सब्जियों के पौधों से पीलापन दूर होने लगता है उनकी ग्रोथ भी बड़ती है। कीट और अन्य बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं। फल बनने से पहले फूल सूखने की समस्या भी समाप्त हो जाती है। नए फूल और फल लगने लगते हैं।

आधा बीघा में काफी है 30 एमएल

किसानोंका तर्क है कि आधा बीघा खेत में 25-30 एमएल शराब काफी है। अधिकांश किसान 11 लीटर और 16 लीटर की स्प्रे मशीन में 100 एमएल तक देसी और अंग्रेजी शराब मिलाकर छिड़काव करते हैं। कई किसान प्रति बीघा करीब 150-200 एमएल शराब का इस्तेमाल करते हैं।

खेती में शराब के इस्तेमाल से शेखावाटी में इसकी खपत बढ़ गई है। भास्कर टीम ने 30 से ज्यादा शराब व्यवसायियों से बात की। इनका कहना था कि खेतों में किए जा रहे छिड़काव के बाद शराब की खपत बढ़ गई है।

इसलिए अपनाया जा रहा है यह तरीका

चनेकी फसल के लिए बाजार में कीटनाशक 500 से लेकर 7000 रुपए लीटर में बिक रहे हैं जबकि देसी शराब 80 रु. अंग्रेजी शराब 200 रु. लीटर में मिल जाती है। कीटनाशक माइक्रोन्यूट्रेंट (लिक्विड) 2000 रु. लीटर इममसीन बेनजॉएट 7000 रु. लीटर है। कमजोर फसल की ग्रोथ के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाई ‘मोनो’ एक एकड़ के लिए करीब 360 रुपए की आती है।

अब 2 किल्लो दहीं करेगी 25 किल्लो यूरिया का मुकाबला

रासायनिक उर्वरक व कीटनाशक से होनेवाले नुकसान के प्रति किसान सजग हो रहे हैं. जैविक तकनीक की बदौलत उत्तर बिहार के करीब 90 हजार किसानों ने यूरिया से तौबा कर ली है | इसके बदले दही का प्रयोग कर किसानों ने अनाज, फल, सब्जी के उत्पादन में 25 से 30 फीसदी बढ़ोतरी भी की है |

25 किलो यूरिया का मुकाबला दो किलो दही ही कर रहा है | यूरिया की तुलना में दही मिश्रण का छिड़काव ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है | किसानों की माने, तो यूरिया से फसल में करीब 25 दिन तक व दही के प्रयोग से फसलों में 40 दिनों तक हरियाली रहती है|

किसान बताते हैं कि आम, लीची, गेहूं, धान व गन्ना में प्रयोग सफल हुआ है| फसल को पर्याप्त मात्रा में लंबे समय तक नाइट्रोजन व फॉस्फोरस की आपूर्ति होती रहती है| केरमा के किसान संतोष कुमार बताते हैं कि वे करीब दो वर्षों से इसका प्रयोग कर रहे हैं| काफी फायदेमंद साबित हुआ है|

लीची व आम का होता है अधिक उत्पादन

इस मिश्रण का प्रयोग आम व लीची में मंजर आने से करीब 15-20 दिनों पूर्व इसका प्रयोग करें. एक लीटर पानी में 30 मिलीलीटर दही के मिश्रण डाल कर घोल तैयार बना लें | इससे पौधों की पत्तियों को भीगों दें | 15 दिन बाद दोबारा यही प्रयोग करना है |

इससे लीची व आम के पेड़ों को फॉस्फोरस व नाइट्रोजन की सही मात्रा मिलती है | मंजर को तेजी से बाहर निकलने में मदद मिलती है | सभी फल समान आकार के होते हैं | फलों का झड़ना भी इस प्रयोग से कम हो जाता है|

एेसे तैयार होता दही का मिश्रण

देशी गाय के दो लीटर दूध का मिट्टी के बरतन में दही तैयार करें | तैयार दही में पीतल या तांबे का चम्मच, कलछी या कटोरा डुबो कर रख दें| इसे ढंक कर आठ से 10 दिनों तक छोड़ देना है | इसमें हरे रंग की तूतिया निकलेगी | फिर बरतन को बाहर निकाल अच्छी तरह धो लें | बरतन धोने के दौरान निकले पानी को दही में मिला मिश्रण तैयार कर लें |दो किलो दही में तीन लीटर पानी मिला कर पांच लीटर मिश्रण बनेगा|

इस दौरान इसमें से मक्खन के रूप में कीट नियंत्रक पदार्थ निकलेगा | इसे बाहर निकाल कर इसमें वर्मी कंपोस्ट मिला कर पेड़-पौधों की जड़ों में डाल दें | ध्यान रहे इसके संपर्क में कोई बच्चा न जाये | इसके प्रयोग से पेड़-पौधों से तना बेधक (गराड़)और दीमक समाप्त हो जायेंगे | पौधा निरोग बनेगा |

जरूरत के अनुसार से दही के पांच किलो मिश्रण में पानी मिला कर एक एकड़ फसल में छिड़काव होगा | इसके प्रयोग से फसलों में हरियाली के साथ-साथ लाही नियंत्रण होता है | फसलों को भरपूर मात्रा में नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिलता होता है | इससे पौधे अंतिम समय तक स्वस्थ रहते हैं|

बोले किसान

सकरा के इनोवेटिव किसान सम्मान विजेता दिनेश कुमार ने बताया, मक्का, गन्ना, केला, सब्जी, आम-लीची सहित सभी फसलों में यह प्रयोग सफल हुआ है| आत्मा हितकारिणी समूह के 90 हजार किसान यह प्रयोग कर रहे हैं| इसके बाद मुजफ्फरपुर, वैशाली के साथ-साथ दिल्ली की धरती पर इसे उतारा है|

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने मार्च 2017 में इनोवेटिव किसान सम्मान से सम्मानित किया| मुजफ्फरपुर के किसान भूषण सम्मान प्राप्त सतीश कुमार द्विवेदी कहते हैं, जिन खेतों में कार्बनिक तत्व मौजूद होते हैं, उनमें इस प्रयोग से फसलों का उत्पाद 30 फीसदी अधिक होता है. इस मिश्रण में मेथी का पेस्ट या नीम का तेल मिला कर छिड़काव करने से फसलों पर फंगस नहीं लगता है. इसके प्रयोग से नाइट्रोजन की आपूर्ति, शत्रु कीट से फसलों की सुरक्षा व मित्र कीटों की रक्षा एक साथ होती है|

दूध उत्पादकों को तोहफा:आ गई बिना बिजली के दूध ठंडा करने वाली मशीन

अमेरिका से आए दो आदमियों ने भारत के दूध उत्पादक किसानों की एक बहुत बड़ी समस्या सुलझा दी। भारतीय दूध उत्पादक प्रतिदिन करीब 10 करोड़ लीटर से ज्यादा दूध का उत्पादन करते हैं।

इस दूध को ठंडा कर पाने की सुविधा गाँवों में बसे अधिकतर उत्पादकों के पास नहीं होती। इसलिए कई बार गाँव से दूर स्थित कलेक्शन सेंटर या शहरी प्रोसेसिंस यूनिट तक भेजते-भेजते दूध खराब हो जाता है और उत्पादक को एक भी पैसा नहीं मिलता।

अमेरिकी आविष्कारकों सोरिन ग्रामा और सैम व्हाइट ने जब भारत के लोगों की इस समस्या को समझा तो एक चिलिंग यूनिट यानि दूध ठंडा करने की मशीन का आविष्कार किया।थर्मल बैटरी से चलने वाली ये मशीन गाँव की आती-जाती बिजली में भी आसानी से चार्ज होकर चल जाती है।

 

प्रोमीथियन पावर सिस्टम कंपनी के तहत बनाई गई इस मशीन का जब इन आविष्कारकों ने गाँवों में पाइलट परीक्षण किया तो उत्पादकों के साथ उन्हें सफलता मिली। वर्तमान समय में देशभर में करीब 200 ऐसी चिलिंग यूनिट ग्रामीण दूध उत्पादक इस्तेमाल कर रहे हैं।

खास तरह की बैटरी का इस्तेमाल

 

प्रोमीथियन पावर कंपनी के चिलर में लगी थर्मल बैटरी एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करती है जिसमें वो बिजली नहीं ऊर्जा बचाती है। इसकी बैटरी में एक पदार्थ होता है जो ठोस से तरल और फिर तरल से ठोस होकर रूप बदलता है।

इस पूरी चिलिंग यूनिट को तीन मुख्य भागों को मिलाकर बनाया जाता है। इसमें एक टैंक होता है जिसमें दूध भरा जा सके। एक थर्मल बैटरी और एक कंप्रेसर होता है।एक चिलिंग यूनिट को करीब 20 किसान आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं।

कैसे काम करती है यूनिट

इस यूनिट के साथ लगा एक कंट्रोल पैनल दूध के तापमान के आधार पर ये संकेत भेजता है कि सिस्टम को शुरू कर देना है। सौर ऊर्जा या फिर कुछ घंटों आई बिजली से ही यूनिट का कंप्रेसर बैटरी को चालू कर देता है जिससे बर्फ जम जाती है। इस बर्फ की ठंडक को दूध को ठंडा करने के लिए धीरे-धीरे भेजा जाता है।

आवश्यक तामपान पर पहुंचते ही दूध को ठंडक भेजना बंद कर दिया जाता है।अब एक बार दूध ठंडा हो जाने के बाद उसे आराम से बर्तनों में भरकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।

और ज्यादा जानकारी के लिए निचे दिए हुए नंबर और पते पर संपर्क करें

Address: Survey 25 2K,, Tathawade Rd, Ravet,
Tathawade, Pune, Maharashtra 411033
Phone: 020 3267 8042

21 करोड़ का सुल्तान, रोज खाता है 15 किलो, सेब-10 किलो गाजर

भारत में गायों की तरह ही सांड की काफी ज्यादा देखरेख की जाती. लेकिन हरियाणा का ये सांड अपने अजीबो गरीब शौक के लिए सोशल मीडीया पर खूब छाया हुआ है। तकरीबन 21 करोड़ का सांड रोजाना शाम को व्हिस्की पीता है लेकिन सांड की इस आदत से उसका मालिक बिल्कुल भी परेशान नहीं।

इस सांड का नाम ‘सुल्तान’ है और इसकी आदत पर उसके मालिक का कहना है कि वो शराब पीना काफी पसंद करता है और उसके ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है।

ये है सुलतान की खुराक

  • नरेश ने बताया कि सुलतान का वजन 16.5 क्विंटल है। उसकी खुराक में 15 किलो सेब, 10 किलो गाजर और 10 किलो दूध शामिल है। इनके अलावा हरा चारा और 10 किलो दाना उसकी खुराक में शामिल है।
  • सुलतान की खुराक पर खास ध्यान रखा जाता है। नरेश का कहना है कि यदि खुराक पर ध्यान नहीं रखा गया तो उसकी सेहत पर इसका सीधा असर होगा।
  • खुराक के अलावा उसकी साफ सफाई पर विशेष ध्यान रखा जाता है, सुलतान रोज शैम्पू से नहाता है और तेल की मालिश कराता है।

शराब का शौकीन

वह कोई राजा महाराजा नहीं है लेकिन उसके शौक किसी राजा महाराजा से कम नहीं है। इक्कीस करोड़ रुपए कीमत का सुल्तान मात्र सात साल और 10 माह का है, लेकिन रोज शाम को खाने से पहले अलग-अलग ब्रांड की शराब पीता है।

प्रति सप्ताह में छ: दिन शाम के खाने से पहले शराब पीता है लेकिन मंगलवार का दिन सुल्तान का ड्राई डे होता है। हरियाणा के कैथल जिले में मुर्रा नस्ल का भैंसा सुल्तान इन दिनों शराब का शौकीन हो गया है।

सुल्तान की उम्र आठ साल की भी नहीं है और अब से पांच साल पहले नरेश ने उसे रोहतक से 2 लाख 40 हजार रुपए में खरीदा था। एक विदेशी ने पिछले दिनों इसकी कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी। सुबह के नाश्ते में सुल्तान देशी घी का मलीदा और दूध पीता है।

 

सुल्तान सोमवार को ब्लैक डॉग, बुधवार को 100 पाइपर, गुरुवार को बेलेनटाइन, शनिवार को ब्लैकलेबल या शिवास रीगल, रविवार को टीचर्स पीता है। कैथल के बूढ़ाखेड़ा गांव के रहने वाले सुल्तान के मालिक नरेश ने बताया कि वे सीमन बढ़ाने के लिए सुल्तान को शराब पिलाते हैं।यह दवाई की तरह दी जाती है। सुल्तान सालभर में 30 हजार सीमन (वीर्य) की डोज देता है जो 300 रुपए प्रति डोज बिकती है।

कूलर-पंखों में रहता है सुलतान

  •  सुलतान को गर्मी से बचाने के लिए उसके पास पंखे और कूलर लगाए जाते हैं। गर्मी के दिनों में सुबह और शाम दो बार उसे नहलाया जाता है।
  •  दो मजदूर दिनभर उसकी देखभाल में लगाए जाते हैं, जो उसके खाने पीने के अलावा साफ सफाई और मालिश आदि करते हैं।
  •  हरियाणा के कैथल जिले के रहने वाले नरेश बैनिवाल ने बताया कि सुलतान नेशनल लेवल पर अवॉर्ड जीत चुका है। उसका यह भैंसा मुर्रा नस्ल का है।

इस हिसाब से वह सालाना 90 लाख रुपए कमा लेता है। सुल्तान वर्ष 2013 में हुई राष्ट्रीय पशु सौंदर्य प्रतियोगिता में झज्जर, करनाल और हिसार में राष्ट्रीय विजेता भी रह चुका है।

राजस्थान के पुष्कर मेले में एक पशु प्रेमी ने सुल्तान की कीमत 21 करोड़ रुपए लगाई थी, लेकिन नरेश ने कहा कि सुल्तान उसका बेटा है और कोई अपना बेटा कैसे बेच सकता है।

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किसानो के लिए खुशखबरी इस साल जमकर बरसेंगे बादल

भारत मौसम विज्ञान विभाग ने कहा कि इस वर्ष मानसून के सामान्य रहने तथा पूरे 100 फीसद बारिश होने की संभावना है। पहले 96 प्रतिशत वर्षा का पूर्वानुमान लगाया गया था। अगर मौसम विभाग का अनुमान सही रहता है, तो आर्थिक विकास की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।

भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक केजे रमेश ने कहा कि एल-नीनो प्रभाव की आशंका कम होने के साथ ही मानसून बेहतर होने की संभावनाएं बढ़ गयी हैं। उन्‍होंने कहा कि एल-नीनो में तात्कालीक बदलावों से संकेत मिलता है कि इस वर्ष मानसून सामान्य रहेगा और दीर्घावधिक औसत में 100 प्रतिशत तक जा सकता है।

एल-नीनो प्रशांत महासागर में जलधाराओं के गर्म होने से जुड़ा मौसमी प्रभाव है। शुरुआती पूर्वानुमान में मौसम विभाग ने कहा था कि दीर्घावधिक औसत में मानसून 96 प्रतिशत रहने की संभावना है जो सामान्य के आसपास है।

केजे रमेश ने कहा, ‘हालात अच्छे के लिए बदल गए हैं। हमने मार्च के मौसम को देखकर ये अनुमान लगाया था कि 96 फीसद वर्षा हो सकती है। लेकिन अब बदलाव हुए हैं, जो हमारे पक्ष में हैं।’ इस अनुमान से लगता है कि ये साल किसानों के लिए अच्‍छा रहने वाला है।

धर, मानसून पूर्व हुई तेज बारिश और आंधी के चलते बिहार के तापमान में गिरावट दर्ज की गई है. यहां आसमानी बिजली से 7 लोगों की मौत हो गई. इसके अलावा करीब 8 लोगों के भी बारिश और तूफान के कारण हताहत होने के समाचार हैं.

सिर्फ 50 हजार में करें टी-शर्ट प्रिंटिंग का बिजनेस

अगर आप काम पैसों में छोटा बिज़नेस करना चाहते है तो आपके लिए स्माल स्‍केल में टी-शर्ट प्रिंटिंग बिजनेस काफी फायदेमंद हो सकता है। प्रिंटेड टी-शर्ट की इन दिनों बाजार में काफी डिमांड है। कुछ लोग अपने हिसाब से भी टी-शर्ट को‍ प्रिंट करवाकर पहनना पसंद करते हैं।

वहीं, स्‍कूल, कंपनियों व अन्‍य संस्‍थाओं में कई मौके पर विशेष टी-शर्ट प्रिंट करवाई जाती हैं। कुल मिलाकर इस बिजनेस में काफी संभावनाएं हैं। खास बात यह है कि यह बिजनेस बहुत ही कम पूंजी के साथ और घर में ही शुरू किया जा सकता है। जानकारों की माने तो केवल 50 से 70 हजार रुपए के इन्‍वेस्‍टमेंट से ही आप शुरुआती स्‍तर पर 30 से 40 हजार रुपए महीना कमा सकते हैं।

इसके अलावा अगर आप इसमें कामयाब हो जाते हैं तो अपने इन्‍वेस्‍टमेंट को बढ़ाकर अपने बिजनेस का दायरा भी बढ़ा सकते हैं। इसके बाद आपकी इनकम भी लाखों रुपए महीना से करोड़ों रुपए साल तक में भी पहुंच सकती है।

50 हजार रुपए से शुरू हो सकता है काम

टी-शर्ट प्रिंटिंग कारोबार को करने के लिए आपको बहुत बड़े इन्‍वेस्‍टमेंट की जरूरत नहीं पड़ती है। इसमें कुछ प्रिंटर, हीट प्रेस, कंप्‍यूटर, कागज व रॉ मटेरियल के रूप में टी-शर्ट चाहिए होती हैं। इस कारोबार को अगर आप बहुत बड़े स्‍तर पर करना चाहते हैं तो आप को सिर्फ 5 -6 लाख की जरूरत होगी ।

कितना होगा कुल खर्च

टी-शर्ट प्रिंटिंग मशीन(हीट प्रेस) = 11,999 रु ,टेफलॉन शीट (2) = 800 रु , सब्‍लीमेशन पेपर प्रिंट के लिए पेपर (100) = 300 रु , 805 प्रिंटर = 16,800 रु , इंक प्रिंटर= 2,100 रु ,प्‍लेन टी-शर्ट (100) =10,000 रु , कंप्‍यूटर = 25,000 रु , कुल खर्च =66,999 रु

कमाई

केवल 70 सेकेंड में तैयार होती है टी-शर्ट टी-शर्ट प्रिंट करने के लिए जिस मशीन की जानकारी दी गई है यह मैन्‍युअल मशीन है। इस मशीन से एक टी-शर्ट 70 सेकेंड तैयार की जा सकती है।

मार्केट-एक्‍सपर्ट कंस्‍लटेंसी सर्विसेज के अनुसार एक टी-शर्ट को प्रिंट करने के लिए लगभग 20 से 30 रुपए का खर्च आता है। यह मैन्‍युअल मशीन में आने वाला खर्च है जबकि अगर आप ऑटोमैटिक डिजिटल प्रिंटिंग मशीन रखते हैं तो इसमें यह खर्च और भी कम होता है। बाजार में प्‍लेन टी-शर्ट को प्रिंट करने के 150 से 200 रुपए चार्ज किए जाते हैं।

इसके साथ ही किसी स्‍कूल, कॉलेज, या बड़े फंक्‍शन में बड़ी संख्‍या में टी-शर्ट प्रिंट करवाकर मंगाई जाती है तो तो इस पर बाजार में लगभग 50 से 60 रुपए लिए जाते हैं। इस तरह अगर आप महीने में 600 टी-शर्ट का ऑर्डर भी पूरा करते हैं और एक टी-शर्ट पर आप 20 रुपए का प्रोफिट भी लेते हैं तो आपकी कमाई 30 हजार रुपए हेा जाती है।

जबकि, बड़े ऑर्डर जिसमें हजारों की संख्‍या में टी-शर्ट पहुंचानी होती हैं.तो आपकी यह इनकम बढ़ भी जाती है।अगर आप इसकी मशीने लेना चाहते है तो इंडियामार्ट और अलीबाबा वेबसाइट पर सर्च कर सकते है

टी-शर्ट प्रिंटिंग कैसे करते है उसके लिए वीडियो भी देखें

दिल दहला देने वाला आंकड़ा ,भारत में हर साल 12,000 किसान कर रहे हैं आत्महत्या

सरकार 2013 से किसानों की आत्महत्या के आंकड़े जमा कर रही है. इसके मुताबिक हर साल 12 हजार किसान अपनी जिंदगी खत्म कर रहे हैं. कर्ज में डूबे और खेती में हो रहे घाटे को किसान बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं.

सरकार के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की. इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे. 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्महत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे.

2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की जबकि 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक इस मामले में दूसरे स्थान पर है. इसके बाद तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1,290), छत्तीसगढ़ (954), आंध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) का स्थान आता है. 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 12,360 और 2013 में 11,772 थी.

 

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता में तीन जजों वाली एक बेंच किसानों की स्थिति और उसमें सुधार की कोशिशों से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रही है. इसी के दौरान सरकार ने ये आंकड़े पेश किए हैं. यह याचिका सिटिजन रिसोर्स एंड एक्शन इनीशिएटिव की तरफ से दायर की गई है

पिछले एक दशक के दौरान किसानों की आत्महत्या के हजारों मामले सामने आये हैं. अधिकतर किसानों ने कीटनाशक पीकर तो कुछ ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. किसानों पर सबसे अधिक मार बेमौसम बारिश और सूखे से पड़ती है और कई बार दाम गिरने से भी इनकी कमाई पर असर पड़ता है.

किसानों की बदहाली की एक तस्वीर पिछले दिनों दिल्ली में भी दिखाई दी तमिलनाडु से आए किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन से तरीकों से सबका ध्यान खींचा.

खेती पर इनकम टैक्स लगाने के पक्ष में सरकार!

नीति आयोग ने आज ग्रोथ पर 15 साल का रोडमैप पेश किया है। इसमें खेती से कमाई को इनकम टैक्स के दायरे में लाने की बात कही गई है। नीति आयोग खेती पर टैक्स के पक्ष में है। सरकार जल्द ही इस बारे में फैसला ले सकती है।

उधर नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय ने सीएनबीसी-आवाज से एक्सक्लूसिव बातचीत में कहा कि खेती से होने वाली आय पर इनकम टैक्स लगना चाहिए। हालांकि खेती से एक सीमा से ज्यादा आमदनी पर इनकम टैक्स लगाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा कि टैक्स की दर और आमदनी की दर वही हो जो शहरों के लोगों की आमदनी पर लगती है लेकिन खेती से होने वाली आमदनी का आकलन एक साल की बजाय लंबे समय सीमा के आधार पर करना चाहिए।