जाने कैसे सरकार की यूरिया सबसिडी बचाने की योजना से किसानो को होगा नुकसान

सरकार ने यूरिया की खपत में कटौती का एक नया रास्ता ढूंढा है, जो वार्षिक 6000-7000 करोड़ रुपए की सबसिडी को बचाने में मदद कर सकता है। अगले 6 महीनों में सभी यूरिया बैग 50 की बजाय 45 किलो में उपलब्ध होंगे।

उर्वरक मंत्रालय का मानना है कि इसके परिणामस्वरूप किसान अगर 2 बैग यूरिया जिसका वजन 90 किलो होगा, का प्रयोग करेंगे। इससे उपभोग के पैटर्न में एक महत्वपूर्ण बदलाव आएगा और महंगी यूरिया आयात में तेज गिरावट आएगी। सरकार ने 2017-18 में यूरिया आयात के लिए 14,000 करोड़ रुपए अलग रखे हैं।

इसका किसानो को नुकसान यह हो सकता है जैसे किसी किसान को अपने खेत के लिए 100 किल्लो यूरिया चाहिए होती थी अब उसे 2 की जगह 3 बैग यूरिया की जरूरत पड़ेगी लेकिन तीसरा बैग सबसिडी के बिना पुरे मूल्य पर ही मिलेगा जिस से किसानो को काफी नुकसान हो सकता है ।

सरकार ने चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सबसिडी के लिए 70,000 करोड़ रुपए का बजट दिया है और खजाने पर भारी बोझ को कम करने के लिए कई समाधान मांगे हैं। सूत्रों ने बताया कि कृषि मंत्रालय द्वारा किए गए विश्लेषण में यह संकेत दिया गया है कि यूरिया का उपयोग प्रति एकड़ 4-6 प्रतिशत तक कम हो गया है।

अधिकारियों ने कहा कि यूरिया खपत में कुल कमी मिट्टी पोषक तत्व की 100 प्रतिशत नीम कोटिंग के कारण हो सकती है। एक अधिकारी ने कहा, ‘‘एक निर्णय ने औद्योगिक गतिविधियों के लिए अत्यधिक सबसिडी वाले यूरिया का उतार-चढ़ाव बंद कर दिया है।’’ यद्यपि भारत ने 2016-17 में 24.2 मिलियन टन यूरिया का उत्पादन किया था लेकिन घरेलू मांग को पूरा करने के लिए उसे 8 मिलियन टन आयात करना पड़ा था।

सरकार ने 2022 तक उत्पादन बढ़ाने के लिए बंद यूरिया निर्माण संयंत्रों को पुनर्जीवित करने के लिए काम शुरू कर दिया है ताकि उर्वरक आयात करने की कोई आवश्यकता न पड़े।

पशुओं में थनों की सोजिश ठीक करने के घरेलू नुस्खे

भारत में थानों की सोजिश बहुत ही आम बीमारी है इसका मुख्या कारण पशु के शेड का गन्दा होना है क्योंकि जब भी पशु गन्दी जगह पर बैठता है तो गंदगी थानों के सुराख़ में चली जाती है ।जिस से उस में कीटाणु पनपने लग जाते है जो इन्फेक्शन का कारण बनते है इस लिए हमेशा पशु का शेड साफ सुथरा होना चाहिए ।डॉक्टरी इलाज से पहले हमें कुछ घरेलू इलाज प्रयोग करने चाहिए। आइये जानते हैं ऐसे कुछ घरेलू नुस्खों के बारे में।

1. सरसों के तेल से हवाने की मालिश करना: थनों की बीमारी होने की सूरत में पशु पालकों के द्वारा थोड़ा-सा सरसों का तेल गर्म पानी में डाल लिया जाता है और इस घोल से हवाने की मालिश की जाती है। सरसों के तेल में, सोजिश को कम करने के गुण पाये जाते हैं और यह खून के दौरों को बढ़ा कर जख्म के जल्दी ठीक होने में मदद करता है। इसके इलावा सरसों का तेल रोगाणु नाशक भी होता है।

2. हल्दी और सरसों के तेल के पेस्ट से हवाने की मालिश करना: पीसी हुई हल्दी को सरसों के तेल में मिलाकर पेस्ट बना लिया जाता है, सोजिश होने की सूरत में हवाने पर इसकी मालिश की जाती है। हल्दी और सरसों के तेल में रोगाणु नाशक हाने के साथ-साथ सोजिश कम करने की भी शक्ति होती है, इनका पेस्ट हवाने की सोजिश को हटाता है, जख्मों को ठीक करता है और रोगाणुओं को नष्ट करता है।

3. काली मिर्च ग्लो और गुड़ खिलाना : काली मिर्च को पीस कर उस में ग्लो मिलाकर, गुड़ में डालकर जानवर को खिला दिया जाता है। ग्लो और काली मिर्च में सोजिश हटाने के गुण होते हैं इसलिए इनका मिश्रण लेवे की सोजिश में सहायक होता है।

4. लहसुन खिलाना :पशुओं को समय समय पर लहसुन खिलाया जा सकता है। लहसुन में जीवाणु नाशक, कीटाणु नाशक, रोगाणु नाशक गुण होते हैं जो लेवे की सोजिश होने से रोकता है।

5. एक अन्य उपाय अनुसार 100 ग्राम मीठा सोडा, 100 ग्राम नींबू का अर्क, 100 ग्राम जौं खार, 50 ग्राम काली मिर्च, 250 ग्राम देसी घी, 1 किलो गुड़ चीनी और 100 ग्राम कलमी शोरा लेकर सभी को मिलाकर दिन में दो बार पशु को दिया जाता है।

पशु के हवाने व थनों की सफाई रखनी चाहिए और साफ सुथरे व सूखे तथा नर्म स्थान पर बांधना चाहिए। दूध निकालने वाले व्यक्ति के हाथ भी साफ होने चाहिए।अंगूठे के दबाव से दूध नहीं निकालना चाहिए। थनों में दूध ज़्यादा समय तक नहीं रहने देना चाहिए।

इन तीन राज्यो में फैला किसान आंदोलन, लोग दोगुने दाम पे खरीद रहे है दूध और सब्जी

अहमदनगर के पुंटांबा गांव से शुरू हुआ 200 किसानों का छोटा सा आंदोलन महाराष्ट्र के साथ-साथ मध्यप्रदेश और गुजरात में भी जोर पकड़ने लगा है। मालवा और निमाड़ क्षेत्र में हड़ताल के दूसरे दिन शुक्रवार को दूध और सब्जी की किल्लत हो गई। शहरों में बंदी का दूध बंटना भी बंद है, क्योंकि गांवों से दूध यहां पहुंच ही नहीं पा रहा है। किसानों को सब्जी उत्पादक और दूध विक्रेताओं का भी साथ मिल गया है।

उधर उज्जैन सब्जी मंडी में पुलिए के साए में सब्जियों की बिक्री हुई। लोगों को दो गुना दाम पर सब्जी और दूध खरीदना पड़ी। किसानों के हंगामें के बाद पुलिस ने यह व्यवस्था की थी। भोपाल में दूध विक्रेताओं ने हड़ताल का समर्थन नहीं किया, राजधानी में सभी स्थानों दूध मिला।

फसलों और दूध के उचित दाम दिलाने की मांग को लेकर हड़ताल के पहले दिन अंचल में गुरुवार को किसानों का गुस्सा फूट पड़ा। जगह-जगह सब्जी और उपज लाने से लोगों को रोका गया। सड़कों पर दूध बहा दिया गया। शाजापुर में किसानों ने एबी रोड पर आलू-प्याज फेंक जाम लगा दिया। पुलिस पर पथराव भी किया, इससे एसडीओपी सहित 8 पुलिसकर्मियों को चोटें आई हैं।

कर्जमुक्ति की प्रमुख मांग को लेकर आंदोलन कर रहे किसान आंदोलन में जारी हिंसा को देखते हुए प्रशासन ने अलग-अलग इलाकों में धारा 144 लागू की. ये इलाके नासिक और अहमदनगर जिले में प्रमुखता से हैं।

नासिक में कुछ किसानों को हिरासत में भी लिया गया है । गुरुवार को शुरू हुआ आंदोलन अब विदर्भ में भी फैलता दिख रहा है। कई हिस्सों में किसानों ने कृषि उत्पादों को सड़क पर फेंक दिया. बुलडाणा में किसानों ने दूध से होली खेली. यह दूध डेयरी को जाना था।

आंदोलनकारियों ने गुरुवार को प्रमुखता से यह कोशिश की कि मुम्बई, पुणे को होने वाली कृषि उत्पाद की आपूर्ति रोक दी जाए, जिसका असर शुक्रवार को दिख रहा है. एशिया की सबसे बड़ी नवी मुंबई मंडी में केवल 146 गाड़ियां सब्जी-फल ले कर पहुंची हैं, जबकि पुणे में दूध संकलन 50 फीसदी घट गया है।

इस बीच, सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे ने किसानों के आंदोलन का समर्थन करते हुए सरकार से मध्यस्थता का प्रस्ताव रखा है, जबकि राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कह चुके हैं कि सरकार किसानों से बात करने के लिए तैयार है. मुख्यमंत्री का आरोप है कि विपक्ष किसान आंदोलन को हिंसक बना रहा है.

 

 

ऐसे करें बारिश के मौसम में खीरे की उन्नत खेती

अगर आप खीरा की उन्नत खेती करना चाहते है तो आपको वैज्ञानिक तरीके से इसकी खेती करनी होगी | खीरा एक मौसमी फसल है, जो की गर्मी के मौसम में ज्यदातर किया जाता है | खीरे की खेती पुरे भारत में की जाती है यह एक Short term फसल है जो की अपना Life Cycle को 60 से 80 दिनों में पूरा करता है |

खीरा हमारे शरीर में पाचन शक्ति को बढ़ाने में मदद करता है, खीरे में Protein, vitamin C, Iron, Carbohydrate जैसे तत्व पाए जाते है  | वैसे तो खीरा गर्मी के मौसम में होता है पर वर्षा ऋतू में खीरे की फसल अधिक होती है |

यह हर प्रकार की भूमियों में जिनमें जल निकास का सही रास्ता हो, उगाया जाता है। अच्छी उपज के लिए जीवांश पदार्थयुक्त दोमट भूमि सबसे अच्छी होती है। इसकी फसल जायद और वर्षा में ली जाती है। अत: उच्च तापक्रम में अच्छी वृद्धि होती है, यह पाले को नहीं सहन कर पाता, इसलिए इसको पाले से बचाकर रखना चाहिए।

खीरे की उन्नत किस्मे

 

पंजाब नवीन : पंजाब नवीन खीरे की अच्छी किस्म है। इस किस्म में कड़वाहट कम होती है और इसका बीज भी खाने लायक होता है। इसकी फसल 70 दिन मे तुड़ाई लायक हो जाती हैं। इसकी औसत पैदावार 40 से 50 कुंतल प्रति एकड़ तक होती है।

इसके अलावा खीरे की प्रमुख प्रजातियां 

  • जापानी लौंग ग्रीन
  • स्ट्रेट एट
  • हिमांगी
  • पोइनसट
  • जोवईंट सेट

बीज की मात्रा :- एक किलो /एकर

बिजाई का ढंग :- बीज को ढाई मीटर की चौड़ी बेड पर  दो दो फुट के फासले  पर बीज सकते  हैं।  बीज दोनों साइड  लगाएं। एक जगह पर दो बीज लगाये।  खीरे की अगेती पैदावार के लिए इसे सुरंग मैं भी बीज सकते हैं। इस  से  कोहरे  से  बचाया  जा  सकता  है।

अगर बिजाई के लिए सुरंग बनानी है  तो दो मीटर  के सरिये को दोनों साइड  मैं ज़मीन मैं गाड़ दे। इसके बाद दोनों अर्ध गोलों पर सो गेज  की प्लास्टिक की शीट डाल  दें। और  दोनों साइड  से मिटटी से  ढक   दें।  और  फरबरी मैं  इन शीट  को हटा  दें।

खीरे के  लिए  खाद :-इस फसल  के लिए चालीस किलो न्यट्रोजन (नबे किलो यूरिया ), बीस किलो फ़ॉस्फ़ोरस ,(सवा क्वेंटल  सुपरफास्फेट ), और बीस किलो पोटास की  जरूरत  होती है। इसमें से एक तिहाई हिसा न्यट्रोजन सारी  फ़ॉस्फ़ोरस पोटाश  बिजाई के समय बेड़ो पे सामानांतर लाइन मैं  पांच इंच  की दूरी  पर  डालें।  बाकि बची काड बढ़ोतरी  के  टाइम पे  डालें।

सिंचाई :-पहले इसकी खाल मैं  पानी लगा  कर डौल के ऊपर  बीज लगाया  जाता है। इसके बाद दो तीन दिन बाद  पानी  दिया  जाता है।  गर्मिओं मैं पांच  छे दिन बाद पानी लगते  रहना  चाहिए।  आम तौर  पे  इसको दस  से  पन्द्र पानी लगते  हैं।

खरपतवार नियन्त्रण:- किसी भी फसल की अच्छी पैदावार लेने की लिए खेत में खरपतवारो का नियंत्रण करना बहुत जरुरी है। इसी तरह खीरे की भी अच्छी पैदावार लेने के लिए खेत को खरपतवारों से साफ रखना चाहिए। इसके लिए गर्मी में 2-3 बार तथा बरसात में 3-4 बार खेत की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।

फ्लो की तुड़ाई :- खीरे के फलों को कच्ची अवस्था में तोड़ लेना चाहिए जिससे बाजार में उनकी अच्छी कीमत मिल सके। फलों को एक दिन छोड़ कर तोड़ना अच्छा रहता है। फलों को तेजधार वाले चाकू या थोड़ा घुमाकर तोड़ना चाहिए ताकि बेल को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।खीरे की फसल को तोड़ते समय ये नरम होने चाहिए। पीले फल नहीं  होने देना चाहिए।

अगली फसल के लिए खीरे का बीज कैसे तैयार करें ?

खीरे का बीज तैयार करते समय खीरे की 2 किस्मो के बीच काम से काम 800 मीटर की दुरी होनी चाहिए।
जिन पौधें पर सही आकार, प्रकार और रंग के फल न आएं उन पौधों को तुरन्त निकाल देना चाहिए। बीज उत्पादन के लिए जब फल पीला पड़ जाए तथा बाहरी आवरण में दरारें पड़ जाएं उस समय तोड़ लेने चाहिए। फलों को लम्बाई में काटकर गुद्दे से बीज को हाथ से अलग करके साफ पानी से धेएं और बीजो को धूप में सुखाकर उनका भण्डारण करें

सिर्फ 3 लाख में ऐसे शुरू करें सोया पनीर का बिज़नेस

किसी भी व्यवसाय व उद्योग के संचालन के लिए पर्याप्त पूजी होना जरूरी होता है।पूजी के अभाव में व्यवसाय संचालन का अरमान धरे के धरे रह जाते है।परन्तु डेयरी उद्योग के संचालन का अरमान रखने वालों के लिए एक मशीन अा गई है जाें गाय भैंस के जैसे भूसा तो नही खाएगी, लेकिन दिन में साै लीटर दूध जरूर देगी।

इस बात पर विश्वास करना थोड़ा मुशि्कल हो रहा होगा, लेकिन ऐसा सम्भव हो चुका है। लघु उद्योग की चाह रखने वाले लोगो के लिए ऐसा मशीन बनाया है जिसमें एक घंटे में 1 किलो सोयाबीन से आठ किलो दूध, 6 किल्लो दही, डेढ़ किलो सोया पनीर, 10 किलो छांछ निकलता है यानी दिन भर मैं सौ लीटर दूध निकलता है।

बेशक इस दूध की पौष्टिकता और स्वाद गाय और भेस के दूध के जैसी नहीं होती लेकिन मरीजों के लिए यह दूध बहुत ही अच्छा माना जाता है । इसके दूध से बनने वाले पनीर को टोफू कहा जाता है जिसकी बाजार मैं बहुत मांग है ।

डेरी की तरह इसको चलने के लिए ज्यादा जगह नहीं चाहिए साथ ही इस मशीन के संचालन के लिए एक व्यकि्त की जरूरी होता है अधिक जनशकि्त की आवश्यकता नही होती ।मशीन की कीमत 2 लाख 50 हजार है। 4 लाख इसका सारा सेटअप हो जनता है जिससे आप 1 लाख रुपया महीना कमा सकते हो । साथ ही खरीददार को कम्पनी की ओर से निशुल्क परशिक्षण दिया जाता है।अधिक जानकारी के लिए 8308482293 पर सम्पर्क कर सकते है।

इस बिजनेस के बारे में और जानकारी के लिए ये वीडियो देखें

ये मशीन कैसे काम करते है इसके लिए ये वीडियो देखे

पशुओं को हीट में लाने के लिए करें इन घरेलु नुख्सों का प्रयोग

कई बार किसान भाईओं को अपने पशओं को हीट मैं लाने मैं काफी दिक्कत आती है | कई बार पशुओं के डॉक्टर को दिखाने पर भी कोई फ़ायदा नहीं होता उल्टा जो पैसे का नुक्सान होता है वो अलग आज हम आपको कुश घरेलू नुक्से बतायंगे जिनको इस्तेमाल कर आप अपने पशुओं को हीट में ला सकते है |

पशुओं को गुड़ देना:- थोड़ी मात्रा में दिया गया गुड़ पशुओं के पेट में सूक्ष्मजीवों के बढ़ने और पाचन शक्ति बढ़ाने में सहायक होता है| इससे पशु की भूख बढ़ जाती है| गुड़ ऊर्जा देने के साथ साथ भूख भी बढ़ाता है इसलिए जरूरी तत्वों की पूर्ति में सहायक होता है जिससे पशु हीट में आ जाता है| पर कोशिश करें की ज्यादा मात्रा में एवं लगातार गुड़ न दें क्योंकि ज्यादा मात्रा में दिया गया गुड़ पशु के लिए परेशानी का कारन बन सकता है|

पशुओं को बिनौले खिलाना:- पशुओं को हीट में लाने के लिए बिनौले दिए जाते हैं क्योंकि इनकी तासीर गरम होने की वजह से पशु जल्दी बोल पड़ता है और नए दूध हो जाता है| पर बिनौले हमेशा उबाल कर ही देने चाहियें क्योंकि कच्चे बिनौलों में गोसीपोल नाम का जहर होता है जिससे पशु को नुकसान भी हो सकता है|

गुड़ और तारामीरा तेल का मिश्रण देना:-अपने पशुओं को गुड़ एवं तारामीरा तेल का मिश्रण लगभग आधा किल्लो से एक किलो 5 – 7 दिनों तक देना चाहिए| कई बार इस मिश्रण में थोड़ा नमक भी मिला लिया जाता है यां कुछ लोग सौंफ, अजवाइन, सौंठ और गुड़ का काहड़ा बना कर भी पशुओं को देते हैं|

गुड़+सरसों के तेल और तिल का मिश्रण देना- इस नुस्खे अनुसार एक पाव गुड़ एवं समान मात्रा में तिल ले कर उसमे लगभग 100 मिलीलीटर तेल डाल कर मिला लिया जाता है फिर इस मिश्रण को पीस कर 4 से 5 दिनों तक पशुओं को खिलाया जाता है|गुड़, सरसों के तेल एवं तिल में बाईपास प्रोटीन होता है इसलिए जब ये सरे तत्व मिल जाएँ तो पशु के गर्भ धारण करने की सम्भावना बढ़ जाती है|

इतने रुपए बढ़ेगा धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य

सरकार जुलाई से शुर होने वाले आगामी फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ा कर 1,550 रुपए करने के बारे में विचार कर रही है।  चालू फसल वर्ष में साधारण किस्म के धान का एम.एस.पी. 1,470 रुपए  क्विंटल था।

‘ए’ ग्रेड धान का एम.एस.पी. थोड़ा उंचा रहता है जो इस वर्ष के लिए 1,510 रुपए निर्धारित किया गया था। सूत्रों के अनुसार कृषि मंत्रालय ने अंतर मंत्रालयीय विचार विमर्श के लिए एक मंत्रिमंडलीय परिपत्र को जारी किया है तथा इसे जल्द ही मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने की संभावना है।

मंत्रालय ने फसल वर्ष 2017-18 के लिए धान के एमएसपी को 80 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। एम.एस.पी. के बारे में जो सुझाव है वह कॉमन ग्रेड के लिए 1,550 रुपए  तथा ‘ए’ ग्रेड के लिए 1,590 रुपए का है। धान के लिए जो मूल्य वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है वह फसल वर्ष 2016-17 के लिए प्रभावी 60 रुपए की वृद्धि से मामूली अधिक है।

प्रस्तावित दरें विशेषज्ञ निकाय कृषि लागत एवं मूल्य आयोग :सीएसीपी: की सिफारिशों के अनुरूप है।  चालू वर्ष में चावल उत्पादन सर्वकालिक उच्च स्तर 10 करोड़ 91.5 लाख टन होने का अनुमान है जिसमें से नौ करोड़ 50.9 लाख टन का उत्पादन खरीफ के धान का है इससे पहले का उच्चम रिकॉर्ड फसल वर्ष 2013-14 का है जबकि 10 करोड़ 66.5 लाख टन धान की पैदावार हुई थी।

ये है देश के 4 करोड़पति किसान, जाने कैसे किसी ने नौकरी और किसी ने चाय बेचना छोड़ कर बन गए सफल किसान

देश का किसान दिन बे दिन गरीब होता जा रहा है । एग्रीकल्‍चर को अक्‍सर लोग फायदे का सौदा नहीं मानते हैं। इस लिए कोई भी खेती में अपना भविष्य नहीं देखता यहाँ तक की खुद किसान खेती छोड़ कर कोई और काम करना चाहते है ।

लेकिन, इन सबके बीच आधुनिक तकनीकों का सहारा और नए तरीकों से खेती करने वाले किसान सफलता की नई कहानी बन रहे हैं। देश में एेसे चार किसान है जिनका नाम भारत के करोपड़पति किसानों में लिया जाता है। ये चारों किसान आज कांट्रेक्‍ट फार्मिंग को आधार बनाकर हर साल लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपए में इनकम करते हैं।

परंपरागत खेती से की शुरआत

गुजरात के अमीरगढ़ ताललुका के रामपुर वदला गांव निवासी इस्‍माइलभाई रहीमभाई शेरू बीकॉम तक पढ़े थे। शुरुआत में माता पिता ने इनसे नौकरी कराना चाहा लेकिन, इनका मन अपनी खेती में ज्‍यादा रहा। परंपरागत खेती करते-करते शेरू लगभग 15 साल पहले मैक डोनाल्‍ड और फिर मैक केन जैसी कंपनियों के संपर्क में आए।

इन कंपनियों के साथ कांट्रेक्‍ट कर शेरू ने उत्‍तम क्‍वालिटी के फ्रेंच फ्राइज और आलू टिक्‍की के लिए आलू उगाना शुरू कर दिया। इनकम की गारंटी के चलते ये दिनोंदिन आगे बढ़ते गए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शेरू भाई के पास आज 400 एकड़ कृषि भूमि है। जिसमें वे हर साल करोड़ों रुपए कमाते हैं।

खेती करने के लिए नौकरी छोड़ी

गुजरात राज्‍य में ही पार्थीभाई जेठभाई चौधरी गुजरात पुलिस में काम करते थे, लेकिन, लगभग 18 साल पहले उन्‍होंने अपनी खेती करने के लिए नौकरी छोड़ दी। बनासकांठा के दांतीवाड़ा में पानी की दिक्‍कत होती है लेकिन, इन्‍होंने अपने खेतों पर ड्रिप इरीगेशन और स्प्रिंकलर लगवाए जिससे वे हर साल 750 एम.एम. पानी चाहने वाले स्‍थान पर बहुत कम पानी में ही काम चलाते हैं।

चौधरी का भी मैक केन के साथ आलू पैदा करने का ही कांट्रेक्‍ट है। चौधरी के खेतों में 2 किलोग्राम तक के आलू होते हैं जिन्‍हें वे हर साल निश्चित दर पर ही बेचते हैं। वर्तमान में उनके पास 87 एकड़ कृषि भूमि अपनी और इतनी ही किराए पर है। पिछले साल चौधरी ने 3.5 करोड़ रुपए के आलू बेचे थे।

20 साल पहले चलाते थे चाय की दुकान

महाराष्‍ट्र के जलगांव के रहने वाले तेनु डोंगर बोरोले 63 साल के हो चुके हैं। करीब 20 साल पहले तक वे चाय बचेने का काम करते थे लेकिन, उस दौरान उन्‍हें किसी ने केले की खेती के बारे में जानकारी दी। उनके पास कुछ जमीन तो अपनी थी और कुछ उन्‍होंने किराए पर ले ली।

इसके बाद उन्‍होंने इस पर केले की खेती शुरू कर दी। कुछ साल पहले ही उन्‍हें ग्रैंड नाइन वैराइटी के बारे में पता चला जिससे उनकी उपज 3 गुनी हो गई। बोरोले आज 100 एकड़ में खेती करते हैं।

प्राइमरी स्‍कूल की नौकरी छोड़ी

जलगांव महाराष्‍ट्र के ही रहने वलो ओंकार चौधरी प्राइमरी स्‍कूल में टीचर थे। उन्‍होंने बोरोले के साथ साथ ही केले की खेती शुरू की थी। आज चौधरी भी 120 एकड़ में केले की खेती कर रहे हैं।

उनका अमेरीका की एक कंपनी के साथ कांट्रेक्‍ट भी है जिसको वे हर साल निश्चित दर पर केला बेचते हैं। चौधरी की साल की इनकम भी करोडों रुपए में है।

मौजूदा खेती की तुलना में सिर्फ दस प्रतिशत खर्च में ऐसे करें जीरो बजट खेती

जीरो बजट प्राकृतिक खेती देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र पर आधारित है। एक देसी गाय के गोबर एवं गौमूत्र से एक किसान तीस एकड़ जमीन पर जीरो बजट खेती कर सकता है। देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है।

जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है।जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।

सफल उदहारण

गाय से प्राप्त सप्ताह भर के गोबर एवं गौमूत्र से निर्मित घोल का खेत में छिड़काव खाद का काम करता है और भूमि की उर्वरकता का ह्रास भी नहीं होता है। इसके इस्तेमाल से एक ओर जहां गुणवत्तापूर्ण उपज होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन लागत लगभग शून्य रहती है। राजस्थान में सीकर जिले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में प्राकृतिक खेती कर उत्साह वर्धक सफलता हासिल की है । श्री सिंह के मुताबिक इससे पहले वह रासायिक एवं जैविक खेती करता था, लेकिन देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र आधारित जीरो बजट वाली प्राकृतिक खेती कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित हो रही है।

प्राकृतिक खेती के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की मानें तो जैविक खेती के नाम पर जो लिखा और कहा जा रहा है, वह सही नहीं है। जैविक खेती रासायनिक खेती से भी खतरनाक है तथा विषैली और खर्चीली साबित हो रही है। उनका कहना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती और जैविक खेती एक महत्वपूर्ण यौगिक है। वर्मीकम्पोस्ट का जिक्र करते हुये वे कहते हैं…यह विदेशों से आयातित विधि है और इसकी ओर सबसे पहले रासायनिक खेती करने वाले ही आकर्षित हुये हैं, क्योंकि वे यूरिया से जमीन के प्राकृतिक उपजाऊपन पर पड़ने वाले प्रभाव से वाकिफ हो चुके हैं।

आयातित केंचुआ या देसी केंचुआ?

वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुओं को भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक मानने वाले श्री पालेकर बताते है कि दरअसल इनमें देसी केचुओं का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। आयात किया गया यह जीव केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक जन्तु है, जो भूमि पर स्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को खाता है।

जबकि हमारे यहां पाया जाने वाला देशी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ जमीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणु जो फसलों एवं पेड़- पौधों को नुकसान पहुंचाते है, उन्हें खाकर खाद में रूपान्तरित करता है। साथ ही जमीन में अंदर बाहर ऊपर नीचे होता रहता है, जिससे भूमि में असंख्यक छिद्र होते हैं, जिससे वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुर्नभरण हो जाता है । इस तरह देसी केचुआ जल प्रबंधन का सबसे अच्छा वाहक है । साथ ही खेत की जुताई करने वाले “हल “ का काम भी करता है ।

सफलता की शुरुआत

जीरो बजट प्राकृतिक खेती जैविक खेती से भिन्न है तथा ग्लोबल वार्मिंग और वायुमंडल में आने वाले बदलाव का मुकाबला एवं उसे रोकने में सक्षम है । इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है । प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक देश में करीब 40 लाख किसान इस विधि से जुड़े हुये आयातित ।

जाने इस डेयरी में क्या है खास जो अमिताभ बच्चन से लेकर अंबानी तक पीते हैं इसका दूध

पुणे के मंचर में चल रही इस डेयरी का दूध अंबानी परिवार, अमिताभ बच्चन, सचिन तेंडुलकर जैसी सेलिब्रिटी तक पीते हैं। यह कोई छोटी-मोटी डेरी नहीं है। 27 एकड़ में फैले एक फार्म में इसका पूरा सेटअप लगा है।

इसमें 3500 गाय हैं। 75 कर्मचारी यहां काम करते हैं। इस डेरी के 12 हजार से ज्‍यादा कस्टमर्स हैं और यहां के दूध की कीमत भी कम नहीं है। यहां का दूध 80 रुपए लीटर बिकता है।

इस फार्म के ऑनर देवेंद्र शाह को देश सबसे बड़ा ग्वाला कहा जाता हैं। वे पहले कपड़े का धंधा करते थे, बाद में दूध के बिजनेस में आ गए। प्राइड ऑफ काउ प्रोडक्ट 175 कस्टमर्स के साथ शुरू किया था।

इनके मुंबई और पूना में 12 हजार से ज्यादा कस्टमर है। इनमें कई सेलेब्स भी शामिल हैं। कई बॉलीवुड से लेकर हाई प्रोफाइल बिजनेसमैन भी शामिल है।

यहां गायों को मिलता है आरो का पानी

गायों को पीने के लिए आरो का पानी दिया जाता है। मौसम को ध्यान में रखकर डॉक्टर चेकअप के बाद गायों को खाना दिया जाता है। दूध निकालने के समय रोटरी में जब तक गाय रहती है तब तक जर्मन तकनीक से उसकी मसाज की जाती है।

2-3 बार सफाई का काम

गायों के लिए बिछाया गया रबर मैट दिन में 3 बार धोया जाता है। यहां 54 लीटर तक दूध देने वाली गाय है। पुराने कस्टमर की रेफरेंस के बिना नहीं बनता नया कस्टमर। हर साल 7-8 हजार पर्यटक डेयरी फार्म घूमने आते है।

दूध निकालने में लगता हाथ

गाय का दूध निकालने से लेकर पैकिंग तक का पूरा काम ऑटोमैटिक होता है। फार्म में दाखिल होने से पहले पैरों पर पाउडर से डिसइंफेक्शन करना जरूरी है। दूध निकालने से पहले हर गाय का वजन और तापमान चेक किया जाता है।

बीमार गाय को डॉक्टर के पास भेजा जाता है। दूध सीधा पाइपों के जरिए साइलोज में और फिर पॉश्चुराइज्ड होकर बोतल में बंद हो जाता है। एक बार में 50 गाय का दूध निकाला जाता है जिसमें सात मिनट लगते हैं।