जीएसटी टेक्स लागू होने से इतने रुपए बढ़ सकते है यूरिया के दाम

देश में गुड्स एंड सर्विस टैक्स यानी जीएसटी एक जुलाई से लागू हो रहा है । जैसे बाकी उद्योगों पर इसका असर पड़ेगा वैसे ही खेती पर इसका असर पड़ेगा ।

लेकिन अफ़सोस की बात है के जीएसटी पास होने के बाद सबसे पहले उर्वरकों पर लगने वाली टेक्स बढ़ जायगी जिस से सभी जरूरी उर्वरकों की कीमत भी काफी बढ़ जायगी ।अब सोचने की बात यह है के पहले से मंदी की मार झेल रहा किसान अब ये नए खर्चे कैसे झेल पाएगा

जीएसटी काउंसिल ने जीएसटी व्यवस्था में उर्वरकों पर लगने वाली टैक्स दर 12% तय की है जबकि अभी ये 4% से 8% टैक्स दायरे में आते हैं।

माना जा रहा है कि इससे सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स के दाम बढ़ जाएंगे। बतौर रिपोर्ट्स, यूरिया के दाम प्रति टन ₹300-₹400 तक बढ़ सकते हैं।

प्राइवेट नौकरी छोड़ कर शुरू की केले की खेती ने बदली किसानो की किस्मत

बिहार के युवा इन दिनों प्राइवेट नौकरी छोड़कर अब केले की खेती करने में लगे हैं। इतना ही नहीं आर्थिक तंगी से जूझ रहे इन युवा किसानों की किस्मत केले की खेती ने चमका दी है। कम लागत में अधिक मुनाफे की इस खेती से आज किसान संपन्न हो रहे हैं।

दो दर्जन से अधिक गांवों में किसान केले की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इन किसानों को उद्यान विभाग से कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। केले की पौध तैयार कर जून-जुलाई और मार्च में दो से ढाई मीटर की दूरी पर बोआई करते हैं।

एक बार फसल बोने के बाद तीन किटंग दो वर्ष में लेते हैं। पहली बार की बोआई में खर्च थोड़ा ज्यादा आता है और समय भी अधिक लगता है। इसके बाद दो-दो पौध जड़ से ही तैयार कर लेते हैं।

एक कटता है तो दूसरा तैयार हो जाता है। केले के बीच में हल्दी, अदरक, सरसों, मसूर, बकला, उड़द आदि की फसल बोकर किसान दोहरा लाभ लेते हैं। एक वर्ष में चार बार पानी चलाना पड़ता है।

एक एकड़ में 18 सौ पौधे

तीन तरह के केले की पौध बिहार के हाजीपुर और गोरखपुर के पीपीगंज क्षेत्र से मंगाते हैं। एक एकड़ में 17 सौ से 18 सौ पौधों को लगाया जाता है।

खेती के पीछे किसानों का आकर्षण लाजमी है। केला की खेती नगदी व्यवसाय है। व्यापारी खेत से ही केला खरीदकर ले जाते हैं। इस खेती से बड़ी संख्या में किसान जहां आत्मनिर्भर हुए हैं, वहीं उनकी आर्थिक तंगी भी दूर हुई है।

इनकी चमकी किस्मत

ततायार के शिव बरन कुशवाहा के दो लड़के संजय कुशवाहा और सत्यप्रकाश कुशवाहा महानगरों में रहकर प्राईवेट नौकरी करते थे। वे चार साल से केले की खेती में जुटे हैं। केले की खेती के मुनाफे ने उन्हें महानगर जाने रोक दिया है। इनके अलावा दर्जनों ऐसे किसान हैं, जो पूरी तरह केले की खेती में रमे हैं।
ऐसे होती है केले की खेती

केले का पौधा जुलाई माह में दो से ढाई मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, इस के लिए मई में ही खेत में पौधा लगाने के लिए एक फीट गड्डा तैयार कर उसमें गोबर की खाद डाल दी जाती है। जिसे जुलाई तक खुला रखा जाता है, ताकि उसे खूब लू लग जाये।

एक बार फसल लग जाने के बाद इसकी तीन साल तक पेडी की जाती है। एक एकड जमीन में 1250 पौधे लागए जाते हैं। ज्यादा बारिश भी फसल को नुकसान नहीं पहुचाती है, बल्कि उसे फायदा ही पहुंचाती है। इस फसल में दवाओं के स्प्रे थोड़े से ही करने पडते है। केले की फसल 13 से 15 माह में तैयार हो जाती है। एक एकड जमीन में तीन क्विंटल से साढे तीन क्विंटल तक केला निकल आता है। बरहाल किसान केले की खेती से खुश है।

परंपरागत खेती में हो रहा है घाटा

बता दें कि रामपुर जिले के किसान मुख्य रूप से धान, गेंहू, गन्ना और मेंथा की खेती करते रहें हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों से मौसम की मार कहे या सरकार की उदासीनता जिसकी वजह से किसान घाटे में जी रहें हैं।

गेंहू और धान की फसलों में लागत ज्यादा और कीमत कम मिल रही है। इसकी वजह से किसान कर्ज के बोझ में दब रहें हैं। ऐसे हालात में किसान दूसरे विकल्प तलाश रहे थे। जिसे केले की खेती ने पूरा किया है। किसानों को केले की खेती से काफी फायदा हो रहा है।

आ गया ब्राजील का कैक्टस अब बंजर भूमि में भी मवेशियों को मिलेगा चारा

कैक्टस एक ऐसा पौधा है जो हर तरह की बंजर और ज़मीन में उग सकता है ।और सोचो अगर इसके इस्तेमाल से पशुआ का चारा बन जाये तो कभी भी कहीं ही चारे की कमी नहीं आयगी। आने वाले दिनों में सूखे क्षेत्र और बंजर जमीन का उपयोग कैक्टस के उत्पादन के लिए किया जा सकेगा। मवेशियों को चारे के लिए कैक्टस की 24 प्रजातियों का उपयोग किसान कर सकेंगे। कैक्टस ब्राजील में पाया जाता है जहां से अब इसे इकार्डा सेंटर लाया गया है।

इस पर शोध किए जा रहे हैं। इकार्डा सेंटर इंटरनेशनल सेंटर फार एग्रीकल्चर रिसर्च इन द ड्राय एरिया के वैज्ञानिक शोघ कार्य में जुटे हुए हैं। यहां पर 24 सितंबर 2014 को ब्राजील से कैक्टस मंगाया गया था। यहां पर 24 पैड मंगाए गए थे जिनमें से ओरेला डे एलीफेंटा मेक्सीकाना प्रुमख हैं। अब यह 3 एकड़ के रकबे में लगा है।

अन्य कामों में भी होता है उपयोग

इकार्डा सेंटर के फार्म मैनेजर विवेक सिंह तोमर ने बताया 24 किस्मों पर शोध चल रहा है। चारे की ये उत्तम किस्में हैं। दो साल पहले ब्राजील से इसे लाया गया था। इस साल इसके पौधों की ऊंचाई दो फीट और चौड़ाई डेढ़ फीट तक हो गई है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी होगा।

इससे ये होते हैं फायदे

कैक्टस बंजर भूमि पर भी हो सकता है। इसके लिए पानी होना लाजमी नहीं है। यह बिना पानी के ही बेहतर उत्पादन देता है। ये चारे के काम आता है। पशु पालकों को इसकी 24 किस्में मिल पाएंगी। इसका उपयोग औषधियों के निर्माण में भी होता है। खासकर सौंदर्य प्रसाधन के लिए इसका उपयोग होता है। इसका गूदा चाॅकलेट बनाने के काम भी आता है। इसका उपयोग पेय प्रदार्थों के लिए भी होता है। मवेशियों के दूध के उत्पादन की क्षमता भी बढ़ जाती है।

मलचिंग तकनीक से खेती, आधे पानी से दोगुनी फसल

21वीं सदी में खेती की बात आते ही झट से आपके मन में सवाल आता है कि अब कौन सी तकनीक है जो खेतों में उत्पादन बढ़ा सकती है और किसान की जेब भर सकती है। नई तकनीकों की लंबी फेहरिस्त में इस बार किसानखबर.कॉम आपके लिए लेकर आया है प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक (Plastic Mulching) की पूरी जानकारी।

प्लास्टिक मल्चिंग क्या है।

खेत में पौधों की जमीन को चारों तरफ से प्लास्टिक की एक फिल्म के जरिए सही ढंग से कवर करने (ढकने) की तकनीक को प्लास्टिक मल्चिंग कहते हैं। यह फिल्म कई साइज, क्वालिटी और कई रंगों में बाजार में मिलती है।

इस तकनीक का क्या फ़ायदा होता है।

अगर आप मिट्टी में कम नमी और मिट्टी के कटाव से परेशान हैं तो ये तकनीक आपके लिए बेहद ही कारगर साबित हो सकती है। इस तकनीक के जरिए खेत में पानी की नमी को बनाये रखने में तो मदद मिलती ही है साथ ही सूरज की तेज धूप के कारण मिट्टी से पानी सोख लेने की समस्या से भी निजात मिल जाती है।

इस तकनीक की मदद से खेत में मिटटी का कटाव रोकने के साथ साथ खतपतवार को भी सफलतापूर्वक रोका जा सकता है।

अगर आप बागवानी करते हैं तो फिर आपको प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से बागवानी में होने वाले खतपतवार को रोकने के अलावा पोधों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने में बहुत मदद मिलेगी। इसके अलावा जमीन के कठोर होने की परेशानी भी खत्म होती है और पौधों की जड़ों का विकास भी अच्छे से होता है।

कैसे होता है सब्जियों की फसल में प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

जिस खेत में सब्जी वाली फसल लगानी हें उसे पहले अच्छे से जुताई कर ले। इस बीच मिट्टी की जांच करवा लें। जांच की रिपोर्ट के हिसाब से जोते हुए खेत में गोबर की खाद उचित मात्रा में डाल दें। इसके बाद खेत में उठी हुई क्यारियां बनाएं। फिर उनके ऊपर ड्रिप सिचाई की पाइप लाइन को बिछाए।

सब्जियों की खेती के लिए 25 से 30 माइक्रोन लास्टिक मल्च फिल्म बेहतर होती है। इस फिल्म को उचित तरीके से बिछाते जाएं और फिल्म के दोनों किनारों को मिटटी की परत से दबाते जाएं। इसे आप ट्रैक्टर से चलने वाली मशीन से भी दबा सकते हैं।

इसके बाद आपको उस फिल्म पर गोलाई में पाइप से दो पौधों की बराबर दूरी तय करके छेद करने होंगे। फिर इन छेंदों बीज या नर्सरी में तैयार पौधों का रोपण करना होगा।

फल वाली फसल में कैसे होता है प्लास्टिक मल्चिंग का इस्तेमाल

फल वाले पौधों के लिए 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च अच्छी रहती है। अगर आपने खेत में फलदार पौधे लगाएं हैं तो फिर इसका इस्तेमाल वहां तक करिए जहां तक पौधे की छाव रहेगी। इसके लिए फिल्म मल्च की सही लम्बाई-चौड़ाई में काट लें। इसके बाद पौधों के नीचे के नीचे उग रही घास और खरपतवार को पूरी तरह हटा दें।

फिर सिंचाई का नली को सही ढंग से सेट करने के बाद 100 माइक्रोन की लास्टिक की फिल्म मल्च को पौधों के तने के आसपास अच्छे से लगाना होता है। इसके बाद उसके चारो कोनो को 6 से 8 इंच तक मिटटी की परत से ढकना जरूरी होगा।

प्लास्टिक मल्चिंग करते समय क्या सावधानियां बरतें।

  • प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।
  • फिल्म में ज्यादा तनाव यानी टाइट नहीं लगानी चाहिए। उसको थोड़ा ढीला छोड़ना चाहिए।
  • फिल्म में जो भी सल हो उसे निकलने के बाद ही मिटटी चढ़ावे।
  • फिल्म में छेद करते वक्त सावधानी से करें और सिचाई नली का ध्यान रख के लगाएं।
  • छेद एक जैसे हो और फिल्म न फटे।
  • मिटटी चढाने में दोनों साइड एक जैसी रखें
  • फिल्म की घड़ी (फोल्ड करना) हमेशा गोलाई में करें
  • फिल्म को फटने से बचाएं, ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए और उपयोग होने के बाद उसे सुरक्षित रखें।

लागत कितनी आती है?

प्लास्टिक मल्चिंग की लागत कई बातों पर निर्भर करती है। जैसे क्यारियां का साइज क्या है और बाजार में फिल्म का मौजूदा रेट क्या है। रेट हर साल कम-ज्यादा होते रहते हैं। लेकिन फिर भी अगर औसत लागत की बात करें, तो औसत लागत प्रति बीघा लगभग 8 हजार रूपए तक आती है।

सरकारी अनुदाना मिलता है क्या?

देश की कई राज्य सरकारों ने प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल करने पर किसानों को अनुदान की सुविधा दे रखी है। मध्य प्रदेश सरकार प्लास्टिक मल्चिंग की लागत का 50 प्रतिशत या फिर अधिकतम 16 हजार रूपए प्रति हेक्टेयर का अनुदान दे रही है।

ऐसे शुरू करें अपना खुद का डेयरी फार्म

आजकल डेयरी फार्म का कारोबार शुरू कर के कोई बेरोजगार या किसान खासी कमाई कर सकता है| पारंपरिक खेती से ऊब चुके या घाटा उठा चुके किसानों के लिए डेयरी फार्म सौगात की तरह है|

सब से खास बात यह है कि सरकार और कई संस्थाएं इस कारोबार को चालू करने के लिए कई तरह की सुविधाएं मुहैया करा रही हैं, जिस का फायदा उठा कर खुद की माली हालत को सुधारा जा सकता है और कुछ जरूरतमंदों को रोजगार भी दिया जा सकता है| इस कारोबार की खास बात यह है कि कम से कम 2 गायों से भी डेयरी फार्म की शुरुआत की जा सकती है|

लघु डेयरी फार्म : उन्नत नस्ल की 2 गायों के साथ लघु डेयरी फार्म शुरू किया जा सकता है| इस पर कुल खर्च 1 लाख 10 हजार रुपए होता है, जिस में 65 फीसदी यानी 70 हजार 850 रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है और लागत का 25 फीसदी यानी 27 हजार 250 रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं|

फार्म शुरू करने वाले को अपनी जेब से करीब 11 हजार रुपए लगाने होंगे| चारा, दाना, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 65 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 20 हजार रुपए खर्च होंगे| दूध और बछियाबछड़े बेच कर सवा लाख रुपए तक की कमाई हो सकती है| इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 42 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाता है|

मिनी डेयरी फार्म : उन्नत किस्म की 5 गायों से मिनी डेयरी फार्म लगाया जा सकता है| इस में करीब 2 लाख 70 हजार रुपए की लागत आती है, जिस में 65 फीसदी यानी 1 लाख 75 हजार रुपए बैंक से कर्ज और 25 फीसदी यानी 67 हजार रुपए विभाग से अनुदान के रूप में आसानी से हासिल किए जा सकते हैं|

डेयरी फार्म लगाने वाले को कुल लागत का 10 फीसदी यानी करीब 27 हजार रुपए का जुगाड़ करना पड़ेगा| मिनी डेयरी फार्म से हर साल करीब 90 हजार रुपए की शुद्ध कमाई की जा सकती है| गायों को खिलाने, इलाज और बीमा वगैरह पर सालाना 1 लाख 90 हजार रुपए और बैंक का कर्ज चुकाने में करीब 46 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे|

मिडी डेयरी फार्म : उन्नत नस्ल की 10 गायों से मिडी डेयरी फार्म खोला जा सकता है| इसे खोलने पर कुल 5 लाख 50 हजार रुपए का खर्च बैठता है| जिस में 70 फीसदी यानी 3 लाख 85 हजार रुपए बैंक से कर्ज मिल सकता है| और लागत का 20 फीसदी यानी 1 लाख 10 हजार रुपए गव्य विकास निदेशालय की ओर से मुहैया कराए जाते हैं| फार्म शुरू करने वालों को अपनी जेब से करीब 55 हजार रुपए लगाने पड़ते हैं|

चारा, दाना, मजदूरी, पशु बीमा और इलाज पर हर साल करीब 3 लाख 67 हजार रुपए खर्च होते हैं और बैंक कर्ज चुकाने में हर साल 1 लाख 8 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे| दूध व बछियाबछड़े बेच कर 6 लाख 37 हजार रुपए तक की कमाई हो सकती है| इस में चारा और लोन चुकाने का खर्च घटा दिया जाए तो सालाना 1 लाख 62 हजार रुपए का शुद्ध मुनाफा हो जाएगा|

व्यावसायिक डेयरी फार्म : इस दर्जे का डेयरी फार्म शुरू करने में करीब 15 लाख रुपए की लागत आएगी| इस के लिए कम से कम उन्नत नस्ल की 20 गायों की जरूरत पड़ती है| इस के लिए लागत का 75 फीसदी यानी साढ़े 10 लाख रुपए बैंक कर्ज और 15 फीसदी यानी करीब 2 लाख रुपए विभागीय अनुदान के रूप में हासिल किए जा सकते हैं|

हर साल गायों को खिलाने, इलाज कराने, बीमा और मजदूरी वगैरह पर साढ़े 7 लाख रुपए और बैंक का लोन चुकाने पर 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च हो जाएंगे| दूध व बछियाबछड़े बेच कर 12 लाख 75 हजार रुपए फार्म मालिक के हाथ में आएंगे और सारा खर्च काट कर 1 साल में 2 लाख 70 हजार रुपए की शुद्ध कमाई होगी|

 

 

 

ऐसे करें जीरे की उन्नत खेती

जलवायु- जीरे की फसल को शुष्क एवं साधारण ठंडे मौसम की आवश्यकता होती है। बीज पकने के समय शुष्क एवं साधारण गर्म मौसम जीरे की फसल के लिए अच्छा रहता है। अधिक वायुमण्डलीय नमी, रोग व कीड़ों को पनपाने में सहायक होती है तथा जीरे की फसल पाला सहन करने में असमर्थ होती है।

उपयुक्त किस्में- आर.जेड. – 19, आर.जेड. – 209, आर.जेड़. – 223, गुजरात जीरा -4 (जी.सी-4)

भूमि तथा भूमि की तैयारी – जीवांश युक्त दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो जीरे की खेती के लिए उपयुक्त होती है। बुवाई से पूर्व यह आवश्यक है कि खेत की तैयारी ठीक तरह की जाये इसके लिये खेत को अच्छी तरह से जोत कर उसकी मिट्टी को भुरभुरी बना लिया जाए।

खाद एवं उर्वरक – जीरे की अच्छी पैदावार लेने के लिये 10 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से जुताई से पहले गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद खेत में बिखेर कर मिला देना चाहिये। एक औसत उर्वर भूमि में 30 किलो नत्रजन एवं 20 किलो फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की दर से दें।

फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई पूर्व आखिरी जुताई के समय भूमि में मिला देना चाहिये एवं नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 30-35 दिन बाद एवं शेष 15 किलो नत्रजन बुवाई के 60 दिन बाद सिंचाई के साथ दे। बुवाई के समय 20 किलो प्रति हैक्टेयर गंधक खेत में डालें।

बीजदर व बीजोपचार – जीरे का 12 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए पर्याप्त है। बीज जनित रोगों से बचाव के लिए बुवाई से पूर्व जीरे के बीज को 2 ग्राम कार्बेण्डाजिम 50 डब्ल्यू.पी. प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर बोना चाहिए।

बुवाई का समय व तरीका- जीरे की बुवाई मध्य नवम्बर के आसपास कर देनी चाहिये। बुवाई आमतौर पर छिटकवां विधि से की जाती है। तैयार खेत में पहले क्यारियां बनाते है। उनमें बीजों को एक साथ छिटक कर क्यारियों में लोहे की दंताली इस प्रकार फीरा देनी चाहिए कि बीज के ऊपर मिट्टी की एक हल्की सी परत चढ़ जाये। कतारों में बुवाई के लिए क्यारियों में 25-30 सेन्टीमीटर की दूरी पर लोहे या लकड़ी के बने हुक से लाईने बना देते हैं। बीजों को इन्हीं लाईनों में डालकर दंताली चला दी जाती है।

सिंचाई- पहली हल्की सिंचाई बुवाई के तुरन्त बाद की जाती है। इस सिंचाई के समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि क्यारियों में पानी का बहाव अधिक तेज न हो। दूसरी सिंचाई बुवाई के एक सप्ताह पूरा होने पर जब बीज फूलने लगे तब करें। इसके बाद मृदा की संरचना तथा मौसम के अनुसार 15-25 दिन के अन्तराल पर 5 सिंचाईयां पर्याप्त होगी। फव्वारा विधि द्धारा बुवाई समेत पांच सिंचाईयां बुवाई के समय, दस, बीस, पचपन एवं अस्सी दिनों की अवस्था पर करें। फव्वारा तीन घण्टे ही चलायें।

निराई-गुड़ाई – प्रथम निराई-गुड़ाई बुवाई के 30-35 दिन बाद व दूसरी 55-60 दिन बाद करनी चाहिये।

कटाई- जीरे की फसल 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। फसल को दांतली से काटकर अच्छी तरह सूखा लेवें।

उपज – उपयुक्त उन्नत कृषि विधियां अपनाने से 6 से 10 क्विंटल प्रति हैक्टेयर जीरा की उपज प्राप्त की जा सकती है।

भण्डारण – भण्डारण करते समय दानों में नमी की मात्रा 8-9 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। संग्रहित जीरे को समय-समय पर धूप में रखें।

अब बाबा रामदेव ले के आ रहे है पतंजलि के आर्गनिक बीज, जाने क्या है खास ?

योग और आयुर्वेद के क्षेत्र में काम करने बाद पतंजलि योगपीठ पर देश में कृषि क्रांति करने की तैयारी में है। इसके लिए गेहूं और धान की नई प्रजाति का बीज तैयार कर लिया गया है।  इसके साथ ही सब्जियों के क्षेत्र में भी बड़ा काम शुरू हो चुका है। आर्गेनिक बीज उपलब्ध कराने के लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की कई जमीनों का उपयोग किया जा रहा है। कृषि कार्यों के लिए बाबा रामदेव ने करीब 500 एकड़ भूमि पर आर्गेनिक खेती शुरू कर दी है।

गौरतलब है कि बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण का उद्देश्य देश में रसायनिक खादों का उपयोग समाप्त कराना है। इस दिशा में एक लंबी कार्ययोजना भी तैयार की गई है। आचार्य बालकृष्ण मानते हैं कि इस कार्य में काफी समय लगेगा, लेकिन यह होकर रहेगा। उनका कहन है कि रसायनिक खादों से तैयार फल सब्जी और अनाज खा-खाकर पूरा देश बीमार हो गया है।

जब तक देश में कंपोस्ट खाद और गोबर खाद का प्रयोग होता था, असाध्य बीमारियां देश में नहीं आती थी।समय के साथ जमीन की उर्वरकता समाप्त होती चली गई। अब जमीनें भी जहर उगलने लगी हैं। आचार्य ने बताया कि इसे देखते हुए पतंजलि योगपीठ ने कृषि क्रांति की तैयारी की है। योजना है कि तमाम देश के किसानों को आर्गेनिक बीज उपलब्ध कराए जाएं। यह कार्य पतंजलि में पहले ही प्रारंभ हो चुका था।

बाबा रामदेव ने बताया कि देश में समय-समय पर खेती के क्षेत्र में नए प्रयोग होते रहे हैं। पतंजलि के वैज्ञानिकों ने गेहूं और धान की नई प्रजाति तैयार की है, जो अधिक उपज प्रदान करती है। इसके बीज कुछ क्षेत्रों में भेजे गए हैं।

योजना है कि बड़े पैमाने पर बीज तैयार कराए जाएं और फिर उनका वितरण देशभर के कृषि केंद्रों पर किया जाए। इन दिनों दो प्रदेशों की 500 एकड़ भूमि पर उन्नत फसल तैयार करने का काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि बीज तैयार करने का काम देश के किसानों को भी सौंपा जाएगा। उद्देश्य है कि आर्गेनिक खाद से किसान अपना बीज स्वयं तैयार करें।

गाय जो रोजाना देती है 65 लीटर दूध,खुराक जानकर रह जाओगे हैरान

एक दिन में 65 लीटर दूध देने वाली गाय देखी है क्या आपने। अगर नहीं तो आज देख लीजिए। इसकी खुराक आपको हैरान कर देगी । हरियाणा दूध के लिए अपनी अलग पहचान रखता है। शायद हरियाणा कुलदीप जैसे कई डेयरी फार्मर की वजह से आज भी अपनी पहचान को बरकरार रख पाया है।

कुलदीप की एक गाय हर रोज 65 लीटर दूध देती है। गाय का नाम एंडेवर है। गाय एंडेवर 5 साल की है वह । हर रोज 65 लीटर दूध देती है। दूध दिन में तीन बार 8 घंटे के अंतराल के बाद निकाला जाता है। वे सुबह 5 बजे फिर दोपहर 1 बजे और रात को 9 बजे दूध निकालते हैं।

कुलदीप 27 साल के युवा हैं और पुश्तैनी बिजनेस संभाल रहे हैं। करनाल के दादूपुर गांव के डेयरी फार्मर कुलदीप ने बताया कि उसकी । गाय की नस्ल होल्सटीन फ्रीजन है, जो विदेशी यानी हॉलैंड की नस्ल है। गाय के लिए उन्होंने यूएसए से सीमन मंगाया था।

इन गायों की खुराक सुनेंगे तो आप यकीन नहीं कर पाएंगे, एक गाय को हर रोज 35 किलो साइलेज, 20 किलो हरा चारा, 12 किलो फीड, 5 किलो चने खा जाती है। इसके अलावा मौसमी सब्जियां मिलती हैं वो अलग।

वे अपनी तीन गायों का दूध बेचकर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने अभी तक किसी गाय की कीमत नहीं लगवाई है।कुलदीप के पास 3 गाय 26 बार अलग-अलग जगह दूध देने की प्रतियोगिताओं में चैंपियन रह चुकी हैं।

गन्ना किसानो को राहत इतने रुपए बढ़ा गन्ने का समर्थन मूल्‍य

मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति (सीसीईए) ने 2017-18 के लिए गन्ने का समर्थन मूल्‍य (एफआरपी) 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाने को मंजूरी दे दी है.
अक्‍टूबर से शुरू होने वाले 2017-18 के इस खरीद मौसम में गन्ना एफआरपी को 255 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है. मौजूदा 2016-17 के खरीद मौसम में गन्ने का एफआरपी 230 रुपये प्रति क्विंटल है.

क्या है एफआरपी?

एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर गन्ना किसानों का कानूनन गारंटीशुदा अधिकार होता है. हालांकि राज्य सरकारों को अपने राज्य में राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय करने का अधिकार होता है या चीनी मिलें एफआरपी से अधिक किसी भी मूल्य की किसानों को पेशकश कर सकती हैं.

मंत्रालय ने उसी दर की सिफारिश की थी, जिसकी सिफारिश कृषि लागत और कीमत आयोग (सीएसीपी) ने की थी. यह एक सांविधिक निकाय है, जो सरकार को प्रमुख कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित करने के बारे में सलाह देता है.

खाद्य मंत्रालय ने 2017-18 के खरीद मौसम के लिए गन्ना एफआरपी 255 रुपये प्रति क्विंटल करने और इसे चीनी प्राप्ति की दर 9.5 प्रतिशत से जोड़ने की सिफारिश की थी. प्राप्ति दर से मतलब गन्ना की पेराई से चीनी प्राप्त करने के अनुपात से है.

अब मिल्क टेस्ट से ही पता चल जाएगा कि पशु गर्भ से है या नहीं

अब दुधारू पशुओं की गर्भावस्था मिल्क टेस्ट से ही एक महीना पहले पता चल जाएगी। इसके लिए कारगिल कंपनी ने बठिंडा में अपनी लेबोरेट्री स्थापित की है। यह डेयरी किसानों के लिए नई तकनीक लेकर आया है जिसमें दुधारू पशुओं की प्रेग्नेंसी के समय गाय में हार्मोन्स की जाँच करके उनके गर्भवास्था का पता लगाया जा सकता है।

इसे प्रेग्नेंसी के लिए मार्कर के तोर पर इस्तेमाल किया जायेगा। इस दिशा में कारगिल ने बठिंडा में एक मिल्क टेस्टिंग प्रयोगशाला की स्थापना की है जिसकी क्षमता हर साल 1 लाख सैम्पल का परीक्षण करने की है।

कारगिल की ओर से लाया गया मिल्क प्रेग्नेंसी टेस्ट प्रजजन के 28 दिनों पहले ही गर्भ अवस्था की स्थिति बता देता है जो की पारम्परिक पद्धति की तुलना में 1 महीना पहले है। इसके उत्पादक प्रजनन के लिए तैयार पशुओं की पहचान कर सकता है जिससे समय पर प्रजनन को सुनिचित किया जा सकता है।

60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत नहीं

पारंपरिक तौर पर किसानो को 60 दिनों तक इंतज़ार करने की जरूरत होती है और पशु चिकित्सक हाथ से इस बात की जाँच करता है की गाय गर्भवती है या नहीं इसमें अधिक समय लगता है और इसमें खर्च भी ज्यादा आता है।

इस मौके पर विक्रम भंडारी का कहना है की ये पहली कम्पनी है और किसानो को देखते हुए इस टेक्नॉलाजी को लाया गया है। इससे पहले उन्होंने ग्लोबल टीम के साथ बात की फिर वह इस तकनीक को लेकर आये। अमृतसर में तकनीक शुरू करने के बाद इसे जीरा लुधियाना और बाकी पंजाब में भी इस तकनीक को लाया जायेगा।

एेसे कर सकते हैं परीक्षण

इसके लिए डेयरी किसानों को 300 रुपए की एक किट खरीदनी होगी। उसके बाद किट के जरिये मिल्क सेम्पल को उनकी लेबोरेट्री में भेज सकते है।