50 हजार प्रति क्विंटल के भाव से बिकी ये खास सोयाबीन

सोयाबीन की विशेष किस्म ‘करुणे’ यहां 50 हजार रुपए क्विंटल में बिकी। इसे जापान से आए दल ने खरीदा जबकि इन दिनों सामान्य सोयाबीन का भाव 28 सौ से तीन हजार स्र्पए प्रति क्विंटल चल रहा है।

दरअसल इतना अधिक दाम मिलने की वजह इस सोयाबीन का खास होना है। हरी सब्जी के रूप में उपयोग की जाने वाली यह सोयाबीन पचने में आसान होती है और कुपोषण के लिए भी लाभदायक मानी गई है। इस किस्म की विदेशों में अच्छी मांग है और जापान इसका प्रमुख खरीदार है। इसकी पैदावार 5 से 6 क्विंटल बीघा बताई जाती है।

कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक रेखा तिवारी ने बताया कि करुणे नई किस्म की सोयाबीन है, जो हरी सब्जी के रूप में उपयोग होती है। शुरुआत में बिजवार (बीज तैयार करने) के लिए जिले में 10 किसानों को 400 ग्राम से एक किलो तक दिया है और उत्पादन विधि भी बताई है। कम पानी में इसका अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

अक्टूबर अंत में जवाहरलाल नेहरू एवं राजमाता सिंयिा कृषि विवि के संयुक्त तत्वावान में जापानी दल ‘जायका प्रोजेक्ट’ के सिलसिले में उज्जैन आया था। उन्हें जिले के उन्नात कृषक निहालसिंह के खेत में करुणे सोयाबीन का अवलोकन करवाया था। दल को यह काफी पसंद आया, वे एक क्विंटल सोयाबीन खरीदकर ले गए।

80 दिन में होती है तैयार

जिले के ग्राम चिंतामन जवासिया के उन्न्त किसान निहालसिंह आंजना ने तीन साल पहले 400 ग्राम बीज बोकर शुरुआत की थी, जो अब तीन क्विंटल तक पहुंच चुकी है। उन्होंने बताया कि इसे खेतों की मेड़ पर रोपा जाता है। जैविक खाद और दवा का उपयोग किया जाता है।

करीब 60 दिन में हरी फली तैयार हो जाती है, जो हरे मटर की तरह सब्जी में काम आती है। 80 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती है। वर्तमान में बिजवार के रूप में यह 500 रुपए किलो तक बिक रहा है। विभिन्न क्षेत्रों के किसान इसे ले जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि जापानी दल ने 50 हजार रुपए में एक क्विंटल सोयाबीन उनसे खरीदा था।

अधिक फाइबर व कम वसा के कारण सुपाच्य

कृषि वैज्ञानिक रेखा तिवारी के अनुसार करुणे सोयाबीन में फाइबर अधिक होता है, इसलिए ये सुपाच्य है। इसमें वसा (फेट ) भी कम होता है। इसके विपरीत पीली सोयाबीन में अपेक्षाकृत वसा अधिक और फाइबर कम होता है। जापानी लोग खाने में सब्जियों का इस्तेमाल अधिक करते हैं। करुणे सोयाबीन भी सब्जी में उपयोग के लिए ही खरीदी है।

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