इस किसान ने खोजी गन्ना बुवाई की एक नई तकनीक जो बदल सकती है किसानों की किस्मत

उत्तर प्रदेश के एक किसान ने गन्ना बुवाई की एक नई तकनीक खोज निकाली है गन्ना किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। इस विधि से गन्ने की बुवाई करने से न सिर्फ बीज कम लगता है बल्कि खाद, पानी और पेस्टीसाइड की मात्रा में भी तीन से चार गुना तक की कमी आती है। इस तकनीक का नाम है ‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’।

यूपी के लखीमपुर खीरी के किसान जिले के शीतलापुर गाँव में रहने वाले युवा हाईटेक किसान दिल्जिन्दर सहोता इस तकनीक से खेती कर रहे हैं। ‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ यानी गन्ने की खड़ी गुल्ली (गन्ने का टुकड़ा) की बुआई।

‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ गन्ना बोआई की यूपी में अपनाई जा रही पारम्परिक तकनीक से बिल्कुल अलग है। ये दो उल्टी दिशाओं वाले कांसेप्ट हैं। किसानों को अपना माइंड सेट बदलना पड़ेगा।

गुल्ली विधि प्लान्टेशन में खेत मे पहले बेड बनाए जाते हैं, फिर बेड के एक सिरे पर विशेष प्रकार से एक-एक आंख की खड़ी गुल्ली काटकर लगाई जाती है।जेट एयरवेज में नौकरी छोड़ अपनी मिट्टी से जुड़े युवा और हाईटेक किसान दिल्जिन्दर कहते हैं, ”खेती में लागत बढ़ती जा रही है ऐसे में किसान इनपुट कास्ट कम करके ही अपनी बचत को बढ़ा सकते हैं।”

गुल्ली विधि में खाद कम से कम, पानी 75 प्रतिशत कम और बीज में सबसे बड़ी बचत होती है। आम किसान बैलों से एक एकड़ में आम तौर पर 25 से 35 कुन्तल तक बीज प्रयोग करते। ट्रेंच विधि से और भी ज्यादा बीज लगता है। पर इस विधि से मात्र चार से पांच कुन्तल बीज में एक एकड़ खेत की बोआई हो जाती है। सर्दियों की बोआई तो दो से तीन कुन्तल गन्ने के बीज से ही हो सकती।

दिल्जिन्दर मुस्कुराते हुए कहते हैं ये बात आम किसान के सामने कहेंगे तो वो हंसेगा। पर ये 100 फीसदी सच है। चार पांच कुन्तल में एक एकड़ गन्ने की बिजाई। ‘खड़ी गुल्ली विधि’ में धूप और पानी का मैनेजमेंट बड़ा जरूरी है। गन्ने की फसल सी-4 टाइप की फसल है सो धूप इसके लिए पूरी मिलनी जरूरी है।

दिल्जिन्दर कहते हैं हम इसे फगवाड़ा मेथड या अवतार सिंह मेथड भी कहते हैं। हमने भी ये विधि पंजाब के किसान अवतार सिंह से ही सीखी। इसके बाद आजमाई और आज पूरी तरह से मुतमुईन हूँ।

‘वर्टिकल बेड प्लान्टेशन’ की इस विधि के बारे में पंजाब के किसान अवतार सिंह कहते हैं, ”ये कुदरती खेती है। गन्ना जब ऊपर की ओर बढ़ता है तो हम उसे लिटा के क्यों बोते हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब में पंच तत्वों से शरीर बनने की बात कही गई। ये विधि भी उसी पर आधारित है। पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु। जिसमें से हम सिर्फ जल का प्रबंधन कर सकते ये ही हमारे हाथ में है। गुल्ली विधि भी इन्हीं पंचतत्वों के आधार पर ही बोई जाती है। इसे हम नेचुरल खेती भी कह सकते।

दिल्जिन्दर सहोता गुल्ली विधि के बारे में बड़ी ही विश्वास के साथ बताते हैं, ”एक एकड़ में लाइन टू लाइन दूरी के आधार पर बीज कम या ज्यादा हो जाता। अगर साढ़े चार बाई दो फीट पर बोते हैं, तो एक एकड़ में करीब चार हजार गुल्ली लगेगी। अगर एक आंख से दस गन्ने स्वस्थ निकल आए तो एकड़ में 40 हजार गन्ने हो जाते है।

चालीस हजार गन्ने चार सौ कुन्तल हो गए, हिसाब साफ है।” दिल्जिन्दर कहते हैं कि अगर गन्ने का वजन बढ़ता है, अगर डेढ़ किलो का हो गया तो छः सौ कुन्तल, दो किलो का गन्ना हो गया तो आठ सौ कुन्तल पैदावार हो सकती है। सबसे अच्छी बात इस विधि में ये है कि आप एक गुल्ली यानी आंख से कितने गन्ने लेना चाहते हो ये आप पर निर्भर करता है। जितने चाहिए उसके बाद मिट्टी चढ़ा दीजिए। टिलरिंग बन्द हो जाएगी।

यूपी में अभी आम गन्ना किसान बीज, खाद पेस्टिसाइड अंधाधुंध डालते गन्ने को बड़ा करने के लिए। लेकिन वर्टिकल बेड प्लान्टेशन में गन्ने को बढ़ाया नहीं जाता। बल्कि उसकी मोटाई बढाई जाती। गन्ना गठीला होगा तो स्वस्थ होगा। मिट्टी चढ़ी होगी तो गिरेगा भी कम।

दिल्जिन्दर कहते हैं, ”अगर हम चार कुन्तल में चार सौ और ज्यादा उत्पादन ले सकते तो फिर खेत मे 30-40 कुन्तल बीज क्यों झोंकना। खर्चो में कटौती करके ही किसान इनपुट लागत बचा सकता है।

वर्टिकल बड का कॉन्सेप्ट दिल्जिन्दर को पंजाब से मिला है। पर दिल्जिन्दर कहते है। करने में डर लग रहा था। विश्वास नहीं हो रहा था कि एक गन्ने के अखुए से 30, 40, 50 तक गन्ने लिए जा सकते हैं, पर किया तो रिजल्ट सामने हैं। मुझे लगता पानी खाद से लेकर बीज की इतनी बड़ी बचत किसी और विधि में होती होगी? 25 से 30 कुन्तल बीज भी बच गया तो किसान के करीब नौ हजार रुपए बच गए। अभी हम चार-पांच फीट पर गन्ना बो रहे पर आगे लाइन टू लाइन दूरी छः आठ फीट भी करेंगे।

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