हल्दी की इस नई किस्म से पूरे साल किसान कर सकते हैं हल्दी की खेती

अभी तक ज्यादातर किसान खरीफ में हल्दी की बुवाई करते हैं, लेकिन अब हल्दी की नई किस्म प्रजाति एनडीएच-98 देश के सभी तरह के जलवायु  में साल भर की जा सकती है।

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “राजस्थान में आयोजित एक कार्यक्रम में हल्दी की ये किस्म रिलीज की गई थी, ये प्रजाति शोध निदेशालय के अंर्तगत सब्जी विज्ञान विभाग में विकसित की गई है, इस प्रजाति को विकसित किए जाने से तीन साल पहले तक अखिल भारतीय स्तर के प्रोजेक्ट मैनेजर की देखरेख में कई प्रदेशों में इस किस्म पर शोध किया गया है।”

हल्दी की नई किस्म एनडीएच-98 इजाद की गई थी।, ये किस्म सभी तरह की जलवायु में उगायी जा सकती है साथ ही इसकी खेती देश के सभी प्रदेशों में की जा सकती है। यह गुणवत्ता व मात्रा में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले ज्यादा बेहतर है।

वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है। वैज्ञानिकों द्वारा बताए गए तरीकों से अगर हल्दी की खेती की जाए तो किसानों को अच्छे फसल की प्राप्ति हो सकती है।

हल्दी की सफल खेती के लिए उचित फसल चक्र को अपनाना जरूरी होता है। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हल्दी की खेती लगातार उसी जमीन पर न की जाए। क्योंकि यह फसल जमीन से ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्वों को खींचती है, जिससे दूसरे साल उसी जमीन में इसकी खेती नहीं करें तो ज्यादा अच्छा होगा।

जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है वो अप्रैल के दूसरे पखवाड़े से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक हल्दी को लगा सकते हैं। जिनके पास सिंचाई सुविधा का अभाव है वे मानसून की बारिश शुरू होते ही हल्दी लगा सकते हैं। जमीन अच्छी तरह से तैयार करने के बाद पांच-सात मीटर, लंबी तथा दो-तीन मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर 30 से 45 सेमी कतार से कतार और 20-25 सेमी पौध से पौध की दूरी रखते हुए चार-पांच सेमी गहराई पर कंदों को लगाना चाहिए।

देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है यह किस्म

डॉ. विक्रमा प्रसाद पांडेय बताते हैं, “शोध में पाया गया है कि ये देशभर में उगाने के सही किस्म है और देश भर में आसानी से उगाई जा सकती है, इसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर 300-400 टन आसानी से हो जाता है, ये गुणवत्ता में भी दूसरी किस्मों के मुकाबले बेहतर है।” इस हल्दी की प्रजाति में पीलापन श्रेष्ठ स्तर तक पांच प्रतिशत और लीफ ऑयल की मात्रा एक से दो प्रतिशत मिली। बिहार और नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्रों के फार्म में इसका उत्पादन भी शुरू किया गया है।

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