आ गया यूरिया कैप्सूल, अब नहीं रहेगी धान में बार बार यूरिया डालने की जरूरत

धान की फसल में यूरिया खाद का इस्तेमाल कम से कम हो, इस तकनीक पर जिला कृषि विज्ञान केद्र के वैज्ञानिक पिछले दो साल से काम कर रहे हैं। यहां के कृषि वैज्ञानिक धान की खेती में यूरिया खाद की जगह यूरिया बैक्वेट नामक कैप्सूल खाद से खेती करने की प्रयोग कर रहे हैं। इसकी खासियत यह है कि फसल में दो- से तीन बार डालने की जरूरत नहीं है।

एक ही बार डालने के बाद फसल तैयार होते तक दोबारा डालना नहीं पड़ता। दूसरा फसल में जल्दी बीमारी नहीं लगती, जिससे बार-बार खाद डालने से बचत और दवाई का खर्च भी आधा हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि इस तकनीक से खेती करने पर लागत से 20% तक कमी लाई जा सकती है। कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर के प्रभारी और मिट्टी वैज्ञानिक डॉ. केडी महंत यह नवाचार कर रहे हैं।

एक बार कर चुके हैं प्रयोग

पहली बार एक एकड़ की खेती में इसका प्रयोग केवीके में किया जा चुका है जो सफल रहा। इस खरीफ सीजन में फिर से 5 एकड़ में इस तकनीक से खेती करने की तैयारी हो चुकी है। अगले साल और बड़े क्षेत्र में किसानों के खेत में इसकी प्रदर्शनी लगाई जाएगी ताकि जिले के किसानों को इससे जोड़ा जा सके।

जिले में लिए यह क्यों जरूरी

नहरों से 92 % सिंचित होने से किसान धान की ही फसल ले रहे हैं। 60% किसान स्वर्णा धान ही लगाते हैं। यह 140 दिन की लंबी अवधि वाली फसल है जिससे खेत में पानी रखना पड़ता है। पानी और खाद के इस्तेमाल से मिट्टी अम्लीय हो चुकी है । केवीके के वैज्ञानिक मिट्टी की उर्वरा शक्ति बचाने की दिशा में काम कर रहे हैं।

100 किलो यूरिया खाद डालने पर 46% नाइट्रोजन ही मिलता है फसल को

कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर में यूरिया बैक्वेट कैप्सूल खाद

क्या है यूरिया बैक्वेट

यूरिया बैक्वेट कैप्सूल को यूरिया खाद और कुछ कैमिकल्स से बनाया है पर यूरिया की तुलना में यह 80% अधिक घुलनशील है और जड़ों में चला जाता है और असर फसल तैयार होने तक रहता है। जबकि सामान्य यूरिया खाद खेत में डालते के बाद तीन प्रकार से नष्ट हो जाता है। लिचिंग यानी पानी में बह जाने, उड़ जाने और ठोस होने से। आधा ही खाद पौधों को मिलता है।

कृषि विज्ञान केंद्र जांजगीर के प्रभारी और मिट्टी वैज्ञानिक डॉ. केडी महंत ने बताया कि धान की फसल के लिए नाइट्रोजन सबसे जरूरी पोषक तत्व है। इसकी पूर्ति यूरिया खाद से होती है, लेकिन 100 किलो यूरिया खाद डालने पर मात्र 46% नाइट्रोजन ही मिलता है, किसान को तीन से चार बार तक यूरिया डालना पड़ता है।

यूरिया बैक्वेट से किसान को दो फायदे

20 फीसदी पैसे की बचत

इससे किसान को अधिक खाद खरीदना नहीं पड़ेगा। कृषि वैज्ञानिक अभी दावा कर रहे हैं कि इससे किसान को खाद और दवा में खर्च होने वाले राशि में 20 फीसदी तक ही बचत हो सकती है। एक किलो यूरिया बैक्वेट कैप्सूल में डेढ़ रुपए में तैयार हो जाता है जिससे यह किसानों को अभी मिलने वाले यूरिया खाद की कीमत में ही मिलेगा।

कतार बोनी 

केडी महंत ने बताया कि चार पौधों में बीच में यूरिया बैक्वेट का एक कैप्सूल डाल दिया जाता है। इसके लिए कतार बोनी करनी होती है। धान की फसल लगाने से हफ्ते दिन से 15 दिन के बीच ही यह काम करना होता है। इसके बाद फसल तैयार होने तक यूरिया देने की जरूरत नहीं होती। पिछले साल एक एकड़ में किए प्रयोग में उत्पादन में कहीं कोई कमी नहीं आई। कतार बोनी से किसी प्रकार की बीमारी भी नहीं लगी थी।

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