सिर्फ दो सिंचाई में ही तैयार हो जाएगा यह गेहूं, एक हेक्टेयर में देगा 45 क्विंटल उत्पादन

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) इंदौर ने गेहूं की नई वैरायटी ईजाद की है। इसे प्रमाणित करने के लिए सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी (सीवीआरसी) में जमा किया गया है। खासियत यह है कि यह दो सिंचाई में पककर तैयार हो जाएगी। गेरुआ और करनाल बंट रोग कभी नहीं आएगा।दूसरा इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन, जिंक व प्रोटीन भरपूर मात्रा में है, जो एनिमिया से बचाने के साथ मनुष्यों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।

गेहूं में मुख्य रूप से पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) रोग होता है। यह रोग फफूंद के रूप में फैलता है। तापमान में वृद्धि के साथ-साथ गेहूं को पीला रतुआ रोग लग जाता है।यह खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में फैलता है, लेकिन रोकथाम के अभाव में यह मैदानी क्षेत्रों में फैल जाता है। उपज प्रभावित होती है, इससे किसानों को नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है।

यह रोग कृषि वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बन गई है, इससे निपटने के लिए कृषि महाविद्यालय जबलपुर ने गेहूं की ऐसी प्रजाति विकसित की है जो 105 दिन में पककर तैयार हो जाएगी।

आईएआरआई के प्रधान वैज्ञानिक एसवी सांई प्रसाद ने बताया कि इसमें बीटा कैरोटीन, आयरन 48.7 पाट्स पर मिलियन (पीपीपी), जिंक 43.7 पीपीपी व प्रोटीन अधिक मात्रा में है। ये तत्व मानव शरीर के लिए बहुत लाभदायक हैं। बीटा कैरोटीन सन बर्न कम करने और त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए लाभदायक है।

इस गेहूं में गेरुआ व करनाल बंट रोग की आशंका भी कम रहती है।आईएआरआई ने वाराणसी वर्कशॉप में एचआई 8777 वैरायटी आइडेंटिफाइड की थी। इसे पूसा बीट 8777 नाम दिया गया। इसे आईएआरआई ने सीवीआरसी को भेजा है। अन्य गेहूं की अपेक्षा यह किस्म चमकदार और आकर्षक है।

वैज्ञानिक एके सिंह ने बताया पूसा 8777 समुद्र तटीय क्षेत्रों जैसे कर्नाटक व महाराष्ट्र में भी अच्छी पैदावार देगी। वहीं मध्यप्रदेश के ऐसे किसान जिनके पास पानी की कमी है वे एक या दो बार की सिंचाई में 40 से 45 क्विंटल पैदावार ले सकते हैं। इस फसल को 105 दिन में काटा जा सकता है।

जेडब्लू (एमपी) 3288 : ये किस्म वर्षा आधारित या सीमित सिंचाई में खेती के लिए उपयुक्त है। दाने बड़े होते है। पौधा झुकता नहीं है तथा इसके दाने छिंटकते नहीं है। कई कल्ले देती है। गेरूआ रोग के प्रतिरोधी तथा 2 सिंचाई मे उपज 45-47 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

जेडब्लू (एमपी) 3173 : आंशिक सिंचाई मे खेती करने योग्य है। गर्मी के प्रति सहनशील, गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, मोटे दानों वाली है। एक-दो सिंचाई में 45-47 क्विंटल उत्पादन होता है। सूखे तथा गेरुआ रोग के प्रति रोधी, चपाटी बनाने के लिए उत्तम है।

जेडब्लू (एमपी) 3211 : सूखे तथा गेरूआ रोग के प्रतिरोधी, चपाती बनाने के लिए उत्तम, एक-दो सिंचाई में पक जाती है। 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन होता है।

नर्मदा 4: यह पिसी सरबती किस्म, काला और भूरा गेरूआ निरोधक है। यह असिंचित एवं सीमित सिंचाई क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसके पकने का समय 125 दिन हैं। पैदावार 12-19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। दाना सरबती चमकदार होता है। यह चपाती बनाने के लिए विशेष उपयुक्त है।

एनपी-404 : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया किस्म असिंचित दशा के लिए उपयुक्त है। यह 135 दिन मे पककर तैयार होती है। पैदावार 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टयर होती है। दाना बड़ा, कड़ा और सरबती रंग का होता है।

मेघदूत : यह काला और भूरा गेरूआ निरोधक कठिया जाति असिंचित अवस्था के लिए उपयुक्त है। पकने का समय 135 दिन है। पैदावार 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना एनपी 404 से कड़ा होता है। हाइब्रिड 65: यह पिसिया किस्म है, जो भूरा गेरूआ निरोधक है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार असिंचित अवस्था में 13 से 19.क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना, सरबती, चमकदार, 1000 बीज का भार 42 ग्राम होता है।

मुक्ता: यह पिसिया किस्म है जो भूरा गेरूआ निरोधक है। असिंचित अवस्था के लिये उपयुक्त है। यह 130 दिन में पकती है। इसकी पैदावार 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसका दाना सरबती लम्बा और चमकदार होता है।

गेहूं की उन्नत किस्मों की विशेषताएं

ऐसे फैलता है ये रोग

पीला रतुआ, गेरूआ रोग और काला कंडुआ (खुली कांगियारी) गेहूं की फसल में फंफूद के रूप में फैलता है। रोग के प्रकोप से गेहूं की पत्तियों पर छोटे-छोटे अंडाकार फफोलो बन जाते हैं। ये पत्तियों की शिराओं के साथ रेखा सी बनाते हैं। रोगी पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं।

यह गेहूं लोगों के लिए भी फायदेमंद

बीटा कैरोटीन एक एंटी ऑक्सीडेंट और इम्यून सिस्टम बूस्टर के रूप में काम करता है। यह शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले मुक्त कणों (फ्री रेडिकल्स) से रक्षा करता है और इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत बनाता है। यह विटामिन-ए का अच्छा स्रोत है, जो त्वचा में सूर्य से होने वाले नुकसान को कम करता है। वहीं आयरन की कमी को दूर कर नवजात, किशोरों व गर्भवतियों में होने वाली खून की कमी को दूर करता है।.

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