भूलकर भी ना बोए गेहूं की ये नई किसम ,वरना पड़ेगा पछताना

भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान (आईआईडब्ल्यूबीआर) की ओर से बनारस में रिलीज की गई गेहूं की नई किस्म डब्ल्यूबी-2 के दावे पर विवाद शुरू हो गया है। इसके खिलाफ करनाल स्थित पूसा (इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट) के क्षेत्रीय संस्थान से रिटायर्ड पौध प्रजनन विभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र लाठर ने केंद्रीय कृषि मंत्री से शिकायत करके मामले को वैज्ञानिक धोखाधड़ी करार दिया है और इसकी सीबीआई जांच की मांग की है।

केंद्रीय कृषि मंत्री, कृषि सचिव, आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) के महानिदेशक आदि से की गई शिकायत में उन्होंने कहा है कि गेहूं की किस्म डब्ल्यूबी-2 को आईआईडब्ल्यूबीआर ने देश की प्रथम जैव पोषित किस्म करार दिया है।उनके मुताबिक यह दावा गलत है, क्योंकि इससे ज्यादा जैव पोषित गेहूं की किस्म डब्ल्यूएच-306 हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हकृवि) ने 52 साल पहले वर्ष 1965 में ही बना दी थी। यही नहीं, अपने रिकॉर्ड को तोड़ते हुए हकृवि ने 25 साल पहले वर्ष 1992 में उससे भी पोषित किस्म डब्ल्यूएच-712 बना दी थी।

अपनी शिकायत के साथ उन्होंने आईआईडब्ल्यूबीआर के पूर्व निदेशक एवं पूसा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफेसर एस नागराजन के रिसर्च पेपर की प्रतिलिपि भी लगाई है जिसमें उन्होंने गेहूं की विभिन्न किस्मों के पोषण तत्वों के बारे में भी जानकारी दी है। यहां बता दें कि गेहूं की जिस किस्म को लेकर बवाल शुरू हुआ है, उसके प्रचार के लिए प्रकाशित किए गए पैम्फलेट में केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की फोटो भी लगाई गई है।

यह है कथित गलत दावे का आधारआईआईडब्ल्यूबीआर ने गेहूं की अपनी नई किस्म डब्ल्यूबी-2 में आयरन की मात्रा 35.4 पीपीएम दशाई है जबकि डॉ. एस नागराजन के रिसर्च पेपर में हकृवि की गेहूं की किस्म सी-306 में यह 70 पीपीएम और डब्ल्यूएच 712 में 85 पीपीएम है। इसी प्रकार डब्ल्यूबी-2 में जिंक की मात्रा 42 पीपीएम दर्शाई गई है जबकि सी-306 में यह 80 व डब्ल्यूएच-712 में 105 है।

 

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