बासमती की खेती करने वाले किसानों के होंगे वारे न्यारे, यूरोप से आई बहुत बड़ी खुशखबरी

बासमती की खेती करने वाले किसान अब जल्द ही मालामाल होने वाले हैं क्योकि यूरोप से किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी आ रही है। आपको बता दें कि अभी तक यूरोपीय संघ के देश भारत से भेजे गए बासमती चावल की खेप की ज्यादतर मात्रा को सिर्फ इस कारण नकार देते थे कि चावल के दानों में दवाओं का अवशेष मिला है।

इसी कारण पिछले कुछ सालों से यूरोपीय संघ के देशों में बासमती का निर्यात काफी कम होने लगा। लेकिन अब भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के विज्ञानियों द्वारा इस समस्या का तोड़ निकाल लिया गया है। जानकारी के अनुसार अब बासमती की तीन नई उन्नत किस्में पूसा बासमती 1847, 1885 व 1886 किसानों को कैमिक्ल इस्तेमाल करने से निजात दिला देंगी।

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आपको बता दें कि पूसा संस्थान परिसर में आयोजित कृषि विज्ञान मेले में बासमती इन नई तीनों किस्मों को किसानों को खेती के लिए दे दिया जाएगा। बासमती की खेती में पूसा संस्थान द्वारा विकसित पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1509 व पूसा बासमती 1401 की हिस्सेदारी करीब 95 प्रतिशत है।

इन किस्मों की खेती में किसानों के साथ एक बड़ी समस्या यह थी कि इन किस्मों में झौंका व झुलसा बीमारी के कारण उन्हें दवाओं का छिड़काव मजबूरन करना पड़ता था। इसी कारण धान से तैयार चावल में कई बार दवाओं के कुछ अवशेष रह जाते थे। और फिर धीरे धीरे इसी वजह से यूरोपीय संघ के देशों ने बासमती का आयात अत्यंत सीमित कर दिया।

निर्यात कम होने के साथ सात किसानों की आमदनी पर भी इसका काफी ज्यादा असर देखने को मिला और किसानों की कमाई कम होती चली गयी। लेकिन अब पूसा संस्थान द्वारा पूसा बासमती 1121 की नई उन्नत किस्म पूसा बासमती 1885, पूसा बासमती 1509 की नई उन्नत किस्म पूसा बासमती 1847 और पूसा बासमती 1401 की नई उन्नत किस्म पूसा बासमती 1886 किस्म का विकास किया गया है।

खास बात ये है कि इन नई किस्मों में झुलसा और झौंका रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बहुत ज्यादा है जिसके चलते किसानों को इन किस्मों की खेती के दौरान दवाओं का इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा। इससे किसानों का खर्चा भी बहुत कम होगा और आमदनी कई गुना तक बढ़ जाएगी। बता दें कि तीनों नई किस्में गुणवत्ता के मामले में पुरानी किस्मों के समान ही हैं।

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