इस किसान ने इस तकनीक से की उत्तर भारत में केले की खेती, अब दूसरे किसानों को सिखा रहा है गुर

मनौली के किसान दिनेश चौहान का जो पड़ोसी किसान कल तक मजाक उड़ाते थे, आज वही उससे केले की फसल कैसे लें और इसके लिए किस प्रकार का तापमान रखें, इसे सीखने के लिए आ रहे हैं। इसी केले की पैदावार से किसान दिनेश चौहान को राष्ट्रपति अवाॅर्ड भी मिल चुका है। खेती को व्यापार बनाने वाले दिनेश चौहान ने दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत में अपनी सफलता के राज सांझा किए। दिनेश ने बताया कि पिताजी के पास तीस एकड़ जमीन थी।

1998 में बीए करने बाद पिता के साथ खेती में हाथ बंटाने लगा। 2001 में अमेरिका की एक कंपनी स्वीटकाॅर्न का बीज लेकर आई। कुछ अलग करने के लिए रिस्क लिया और आज उसी का नतीजा है कि खादर के 40 प्रतिशत किसान केवल स्वीटकाॅर्न की खेती कर रहे हैं। परंपरागत खेती छोड़ चुके हैं। स्वीटकाॅर्न ने आठ गांवों के किसानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी है।

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दिनेश चौहान ने कहा कि केले की खेती केवल दक्षिण भारत में होती थी। उसने इस खेती को यमुना की रेतीली जमीन में लेने का प्रयास किया। यह खेती काफी चुनौतीपूर्ण थी। सबसे ज्यादा चुनौती मौसम की थी। उन्होंने सबसे पहले इसके लिए प्लॉन बनाया। इस फसल को अगेती फसल की तरफ से लिया।

जिससे सर्दी होने तक केले का पौधा जवान हो जाए और वह सर्दी को सहन कर सके। गर्मी के मौसम में रैनगन से कृत्रिम वर्षा का प्रबंध किया गया। जिससे रेनगन से पानी का छिड़काव किया जा सके। इस तरह से वे केले की खेती करने में कामयाब हुए। केले से अब साल में चार लाख की आमदनी हो रही है।

पोली हाउस में तैयार कर रहे सब्जी

अवाॅर्डी किसान दिनेश चौहान पोली हाउस में सब्जी की खेती कर रहे हैं। चौहान ने बताया कि सब्जी की फसल पूरी तरह से प्रदूषण, खरपतवार तथा कीट पतंगों से दूर रहती है। शिमला मिर्च, खीरा, टमाटर, स्टाॅब्रेरी, घीया जैसी फसल पोली हाउस के अंदर तैयार हो रही हैं। छोटे से गांव में तैयार होने वाली स्वीटकाॅर्न, बेबीकाॅर्न देश व विदेश में काफी डिमांड हैं। एक सोच ने उनकी जिदंगी बदल दी। यहां के किसान पहले वे आढ़ती के सामने कर्ज के लिए हाथ जोड़ते थे।

आज आढ़ती उनके पास खेत में ही फसल खरीदने पहुंच रहे हैं। स्वीटकाॅर्न ने तो किसान की अंधेरी जिदंगी में रोशनी पैदा कर दी है। पहले एक ट्रैक्टर को खरीदना किसान का सपना होता था। आज हर दूसरे किसान के पास कार हैं। किसानों के पास मजदूरी करने के लिए बाहर से लेबर आ रही है। एक समय था जब पूरा परिवार खेत में काम करता और दो जून की रोटी भी मुश्किल से खा पाता था। सब्जी ने उनके गांव की तकदीर बदल दी है।